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हस्तरेखाविद · अध्याय 7

बाईस तारीख़

· 12 मिनट का पाठ

7 मार्च 2020

कहते हैं, मुनीम लोग नींद में भी अंक देखते हैं, और बाज़ार की कैशियर औरतें आँखें बंद करके भी रेज़गारी की खनक सुनती हैं; हमारे मोटर-डिपो में एक डिस्पैचर था जो चालीस साल बसें गिनता रहा और रिटायर होकर पहले छह महीने आदत से खिड़की से आँगन की गाड़ियाँ गिनता रहा — सुबह और शाम, — और बहुत दुखी होता अगर कोई रात बिताने वापस न आती। जो भी देर तक कुछ गिनता है, वह देर-सबेर अंकों में अंक नहीं, क्रम देखने लगता है, और तब कोई भी फ़ालतू इकाई इस क्रम से ऐसे निकली दिखती है जैसे तख़्ते से कील। केशा के लिए ऐसी इकाई बन गई बाईस मार्च।

मार्च की फ़ोटो छब्बीस जमा हो गई थीं।

केशा छह की शाम से सात की सुबह तक उन पर बैठा रहा, और जब साढ़े सात बजे ग्रीशा लोहे की सीढ़ियों पर खड़खड़ाया, केशा अब भी बैठा था, और लैंप अब भी जल रहा था, और मग में चाय पर एक पतली झिल्ली जम गई थी, जैसे पोखर पर बर्फ़ की परत।

उसने हर एक देखी। क्रम से, पहली मार्च से। फ़ोटो खोलता, देखता, जैसे हमेशा देखता था, — महीना सड़क की तरह उसके सामने खड़ा हो जाता, — और इस सड़क पर बिना जल्दी किए चलता, दिन-ब-दिन, बाईस तक। और बाईस पर रुक जाता।

पफ़र जैकेट वाली औरत, जिसे बैंक में रखेंगे पर उस विभाग में नहीं, — बाईस साफ़। एक शांत इतवार, वह केक बनाएगी।

छड़ी वाला बूढ़ा, «बटुआ», «बारह तारीख़ ही सही», — धब्बा।

केशा उसे देर तक देखता रहा। तब, पहली को, उसने यह नहीं देखा था। उसे इसका यक़ीन था — वह इसे चूक नहीं सकता था, तब उसने यह महीना ध्यान से पढ़ा था, बिल्कुल आख़िर तक, वह हमेशा आख़िर तक पढ़ता था। तब कोई धब्बा नहीं था। और अब — था। काला, गोल, फैले किनारों वाला।

मतलब, वह बाद में आया। मतलब, हफ़्ता भर पहले खींची फ़ोटो — बदल गई।

नहीं, केशा ने ख़ुद को सुधारा। फ़ोटो नहीं बदली। फ़ोटो बस एक तस्वीर है, पिक्सेल, लैपटॉप की याद में अंक। महीना बदला है। वह महीना जो वह फ़ोटो के पार देखता है। इस बूढ़े का भविष्य हफ़्ते भर में बदल गया — और फ़ोटो, खिड़की की तरह, अब कुछ और दिखाती है।

ऐसा होता था। भविष्य पत्थर पर खुदा नहीं होता, भविष्य — नदी की तरह है, और अगर उसमें पत्थर फेंको, तो धारा थोड़ी खिसक सकती है। केशा यह जानता था। कभी-कभी आदमी चर्मपत्र पढ़कर कुछ करता — और महीना ज़रा-सा मुड़ जाता। ज़रा-सा। इतना नहीं कि किसी साफ़ दिन के बीचोबीच अचानक काला धब्बा आ जाए।

वह आगे बढ़ा।

डिलीवरी वाला ल्योन्या, पीली जैकेट में, «दिल», — केशा ने उसकी फ़ोटो खोली और बाईस तक पहुँचने से पहले ही समझ गया कि यहाँ कुछ गड़बड़ है। ल्योन्या का महीना वैसा नहीं था जैसा उसने पहली मार्च को पढ़ा था। तब केशा ने देखा था: लड़की नहीं लौटेगी, पर दस तारीख़ को ल्योन्या किसी और से मिलेगा, एक कैफ़े में, जहाँ वह ऑर्डर उठाने जाएगा। सीधा-सादा अच्छा महीना, उजला। केशा ने यही लिखा था।

और अब ल्योन्या का महीना नौ पर टूट रहा था।

टूट नहीं रहा था — काले में डूब रहा था। धब्बा बाईस पर नहीं, नौ पर था, और वह तमारा पेत्रोव्ना और कुबिश्किन वाले से बड़ा था — दो, तीन दिनों पर फैला हुआ, — और उसके बाद सब बस फीका नहीं, स्लेटी था, ख़ाली, जैसे कोई पुरानी उड़ी हुई तस्वीर जिसमें अब कुछ समझ न आए।

केशा इसे देर तक देखता रहा। फिर आगे बढ़ा।

दो और — धब्बा। वह आदमी जो गाड़ी बेचना चाहता था। और वह लड़की, छात्रा, जिसे परीक्षाएँ पास करनी थीं। दोनों — बाईस पर।

बाक़ियों के यहाँ — साफ़।

छब्बीस में से पाँच। सब — पहली मार्च के बाद। सब — बाईस पर, ल्योन्या को छोड़कर।


तब केशा ने एक और काम किया, जिसका ख़याल उसे सुबह होते-होते आया। उसने फ़रवरी वाला फ़ोल्डर खोला।

फ़रवरी की फ़ोटो फ़रवरी दिखाती थीं। पर अगर कोई ग्राहक, मान लो, बीस फ़रवरी को आया, तो केशा उसका महीना तीस दिन आगे देखता था — बीस मार्च तक, इक्कीस तक। बाईस तक नहीं — एक-दो दिन कम पड़ते। पर फिर भी।

केशा ने अट्ठाईस फ़रवरी को खींची फ़ोटो खोली — महीने की आख़िरी ग्राहकों में से एक, एक जवान औरत, «काम»। और उसके महीने में बिल्कुल आख़िर तक गया, अट्ठाईस मार्च तक।

उसका बाईस साफ़ था।

उसने अगली खोली, सत्ताईस की। साफ़। पच्चीस की। साफ़। बाईस फ़रवरी की — यहाँ महीना बाईस मार्च पर ख़त्म होता था, बिल्कुल किनारे पर, और केशा ने यह आख़िरी दिन मुश्किल से देखा — साफ़।

एक भी धब्बा नहीं। फ़रवरी की किसी फ़ोटो में नहीं।

केशा कुर्सी पर पीछे टिक गया।

धब्बा भविष्य में हमेशा से नहीं था। वह आया था। किसी पल आया — और उस पल से सारी फ़ोटो में उभरने लगा, पुरानी में भी और नई में भी, कुछ लोगों के यहाँ और कुछ के नहीं। और केशा जानता था — अंदाज़ा नहीं लगा रहा था, जानता था, उसी भारी पसलियों-तले वाले ज्ञान से, — कि वह पल कब था।

पहली मार्च की शाम। जब दुकान में, लोहे की सीढ़ियों पर क़दमों की आवाज़ किए बिना, लंबे कोट वाला आदमी आया था।


— नमस्ते, उस्ताद जी, — ग्रीशा ने परदे के पीछे से कहा।

— नमस्ते, — केशा ने कहा। उसकी आवाज़ भर्राई हुई थी, जैसे उस आदमी की जो रात भर चुप रहा हो।

— आप क्या, सोए नहीं?

— नहीं सोया।

ग्रीशा चुप रहा। फिर, लगा, कुछ कहना चाहता था, पर इरादा बदला, और बाल्टी लेने चला गया।

केशा ने लैपटॉप बंद किया। आँखें ऐसे दुख रही थीं मानो उनमें रेत भर दी गई हो। वह बैठा हरे परदे को देखता रहा, सुनता रहा कि ग्रीशा बाल्टी कैसे खड़खड़ा रहा है, पोंछा सिलों पर कैसे छपछपा रहा है — दूर वाली दीवार से दरवाज़े की ओर, एक भी छोड़े बिना, — और अचानक समझ गया कि उसे क्या करना है।

वह नहीं जानता था कि धब्बा क्या है। वह उसे देखता था, पर यह नहीं देखता था कि उसमें क्या है। वह खिड़की पर दाग़ जैसा था — खिड़की से देखो, गली दिखती है, और एक जगह — दाग़, और उसके पार कुछ नहीं दिखता। और यह देखने के लिए कि दाग़ के पीछे क्या है, पास जाना होगा। पूरे महीने को नहीं, बस इस एक दिन को देखना होगा। «सावधान» पढ़ना होगा।

«सावधान» — एक ख़ास तरह का पढ़ना था। केशा को वह पसंद नहीं था। «दिल» या «काम» में वह महीने को चौड़ा देखता था, जैसे पहाड़ से, सब एक साथ देखता था, और जो चाहिए वह चुन लेता था। पर «सावधान» में नीचे उतरना पड़ता था, ख़ुद महीने के अंदर, और उसमें धीरे-धीरे चलना पड़ता था, हर कोने के पीछे झाँकते हुए, — और कोनों के पीछे जो कुछ छिपा होता, वह जवाब में तुम्हें देखता। «सावधान» के बाद केशा का सिर हमेशा दुखता था। इसीलिए वह पाँच चाँदी का था — «सबसे बड़े दिन» के सिवा सबसे महँगा।

वह पुरानी फ़ोटो से भी «सावधान» पढ़ सकता था। पर पुरानी फ़ोटो में धब्बा जैसे शीशे के पार था — उभरा हुआ, प्रेत जैसा। ताज़ा फ़ोटो चाहिए थी। आज की। एक ज़िंदा आदमी चाहिए था जिसके यहाँ धब्बा हो, — और ज़रूरी था कि वह आज आए।

केशा नहीं जानता था कि ऐसा कोई आएगा या नहीं। पर उसने तय किया: अगर आया — उसे «सावधान» पढ़ेगा। मुफ़्त।


सात मार्च हमारे शहर में एक ख़ास दिन है, त्योहार की पूर्व-संध्या। मर्द इस दिन चिंतित चेहरों के साथ गलियों में घूमते हैं, जैसे इम्तिहान से पहले, और बाज़ार के पास फूलों के ठेले पर जो कुछ है सब ख़रीद डालते हैं, ट्यूलिप से लेकर मिमोसा तक, जिसे फूलवाली गाल्या मौसी दक्षिण से टमाटर की पेटियों में लाती है; दोपहर तक मिमोसा ख़त्म, शाम तक ट्यूलिप ख़त्म, और देर से पहुँचने वाले जेरेनियम के गमले ख़रीदते हैं और बीवियों से कहते हैं कि यह «लंबी याद के लिए» है। औरतें इस दिन ऐसा दिखाती हैं कि वे कुछ उम्मीद नहीं कर रहीं, और इसीलिए भविष्य बताने वालों के पास ख़ासतौर पर अक्सर जाती हैं — यह जानने कि क्या मिलेगा और मिलेगा भी या नहीं। सड़क पार मादाम ज़ोया सात तारीख़ को बीस-बीस लोगों को देखती थी; केशा के पास, जहाँ पाँच से ज़्यादा कभी नहीं होते थे, आठ बजे से कतार लग जाती थी।

उस दिन सबसे पहले दो बहनें आईं, एक-दूसरे से पानी की दो बूँदों जैसी मिलती-जुलती — दोनों छोटी, नुकीली नाक वाली, फुँदने वाली एक जैसी बुनी टोपियों में, — और दोनों ने «दिल» लिया, और दोनों ने एक ही आदमी के बारे में, और ग्रीशा, उन्हें किताब में लिखते हुए, डरता रहा कि फ़ोटो गड़बड़ा जाएँगी, और एहतियातन उन पर लिखता गया: «बहन 1», «बहन 2»। केशा ने दोनों को पढ़ा। दोनों का बाईस साफ़ था। वह आदमी, वैसे, किसी को नहीं मिलेगा — वह शादीशुदा है, बस उन्हें अभी पता नहीं।

तीसरा एक आदमी था जिसे «बटुआ» चाहिए था, — गठीला, चमड़े की कैप में, हार्डवेयर की दुकान की थैली लिए, जिसमें से वॉलपेपर का एक रोल झाँक रहा था, — और जब तक ग्रीशा उसकी हथेली की फ़ोटो खींच रहा था, वह समझाता रहा कि वॉलपेपर बीवी के लिए त्योहार का तोहफ़ा है, क्योंकि फूल मुरझा जाएँगे, और वॉलपेपर रहेगा, और यह, उसकी राय में, इतनी अकाट्य दलील थी कि ग्रीशा कुछ जवाब नहीं ढूँढ पाया। उसका बाईस साफ़ था: उस दिन वह ठीक इसी वॉलपेपर को चिपकाएगा और डिज़ाइन को लेकर बीवी से झगड़ेगा।

चौथी कोई पैंतीस साल की औरत आई, लंबी जैकेट में, बच्चागाड़ी में बच्चे के साथ। उसका नाम ओक्साना था। उसे «काम» चाहिए था: उससे तरक़्क़ी का वादा किया गया था, पर बात टलती जा रही थी, और वह जानना चाहती थी कि उसे धोखा दिया जा रहा है या नहीं।

ग्रीशा ने उसकी हथेली की फ़ोटो खींची। बच्चागाड़ी में बच्चा उसे गोल-गोल आँखों से देख रहा था और दस्ताना चूस रहा था।

केशा ने फ़ोटो खोली।

तरक़्क़ी — हाँ, मिलेगी, बस मार्च में नहीं, अप्रैल में। अफ़सर धोखा नहीं दे रहा, बस ख़ुद ऊपर से फ़ैसले का इंतज़ार कर रहा है। केशा ने लिखना शुरू कर दिया था, — और, जैसा अब हमेशा करता था, महीने पर बाईस तक नज़र दौड़ाई।

धब्बा।

केशा का हाथ काँपा, और क़लम से चर्मपत्र पर एक बूँद गिरी — छोटी, गोल। उसने उसे देखा। फिर फ़ोटो को। फिर, धीरे से, क़लम रख दी।

— ग्रीशा, — उसने पुकारा।

ग्रीशा ने परदे के पीछे झाँका।

— उनसे कहो: उस्ताद «सावधान» भी देखना चाहते हैं। मुफ़्त।

ग्रीशा की आँखें फटी रह गईं। ऐसा कभी नहीं हुआ था। उस्ताद कभी कुछ मुफ़्त नहीं करते थे — इसलिए नहीं कि कंजूस थे, बल्कि इसलिए कि दादा कहते थे: «मुफ़्त की — क़द्र नहीं होती। मुफ़्त की — सच नहीं होती। आदमी को पैसा देना चाहिए, तभी वह यक़ीन करता है।» ग्रीशा यह नहीं जानता था, पर जानता था कि मुफ़्त — नहीं होता।

— मुफ़्त? — उसने दोहराया।

— मुफ़्त। कहो — तोहफ़ा है। त्योहार के मौक़े पर। कल आठ मार्च है।

ग्रीशा बाहर गया। केशा ने सुना कि वह ओक्साना से कैसे बात कर रहा है — अटपटे ढंग से, अटकते हुए, — कि ओक्साना पहले समझती नहीं, फिर हैरान होती है, फिर हँसती है: «अच्छा, अगर तोहफ़ा है तो…» बच्चागाड़ी में बच्चा गुनगुनाया।

केशा ने फिर फ़ोटो ली।


«सावधान» पढ़ने के लिए आँखें बंद करनी होती थीं।

पूरी नहीं — ज़रा-सी, बस इतनी कि फ़ोटो धुँधली हो जाए, कि हथेली की रेखाएँ धुँधली छायाएँ बन जाएँ। और तब महीना हमेशा की तरह सड़क बनकर सामने खड़ा नहीं होता था, बल्कि तुम्हें चारों ओर से घेर लेता था। तुम भीतर होते थे। दिनों में ऐसे चलते थे जैसे कमरों में। और हर कमरे में कुछ होता था: कहीं फ़र्नीचर, कहीं खिड़की, कहीं कोना, जिसके पीछे अँधेरा हो।

केशा ओक्साना के मार्च में चल रहा था।

सात — आज — उजला कमरा, वह हँस रही है, बच्चा गुनगुना रहा है। आठ — फूल, पति ट्यूलिप लाता है, पीले। नौ, दस — काम, मामूली, स्लेटी, बिना कोनों का। बारह — बच्चे को बुख़ार, पर कुछ डरने वाला नहीं, शाम तक उतर जाएगा। पंद्रह — वह इमारत के दरवाज़े पर फिसलेगी, पर सँभल जाएगी। यहाँ एक कोना था, नुकीला, — और केशा ने उसे याद रखा, लिखने के लिए: «पंद्रह को दरवाज़े पर पैरों के नीचे देखिए।» सोलह, सत्रह…

बाईस के जितना पास, कमरे उतने अँधेरे होते जा रहे थे। मुसीबत से नहीं — किसी और चीज़ से। मानो वहाँ, आगे, कोई खिड़की के पास खड़ा रोशनी रोक रहा हो।

बीस। इक्कीस।

बाईस।

बाईस का कमरा काले से भरा था। अँधेरे से नहीं — अँधेरा कई तरह का होता है, नरम होता है, रात वाला, गाढ़ा होता है, तहख़ाने वाला, — बल्कि ठीक स्याही से। केशा इस कमरे की दहलीज़ पर खड़ा था, और स्याही ठीक उसके पैरों से शुरू होती थी, और आगे चली जाती थी, और न दीवारें दिखती थीं, न छत, न फ़र्श — बस एक काली चिकनी सतह, जैसे रात को तालाब की।

वह उसमें देखता रहा। आँखें दुखने तक देखता रहा, — और जब दुखने लगीं, तब भी नहीं रुका।

और धीरे-धीरे, जैसे डेवलपर में फ़ोटो की तस्वीर उभरती है, कालेपन में कुछ उभरने लगा।

पहले — बस एक छाया, बाक़ी से ज़रा गहरी। फिर — आकार। लंबा, गहरा, खड़ा हुआ। ऊँचा। नीचे की ओर, बिल्कुल फ़र्श तक, चौड़ा होता हुआ, — मानो कोई आदमी लंबे, एड़ियों तक के कोट में हो।

आकृति धब्बे के बिल्कुल बीच में खड़ी थी। निश्चल। जैसे बस-स्टॉप पर बस का इंतज़ार करते हुए खड़े रहते हैं, — धीरज से, घड़ी देखे बिना, यह जानते हुए कि बस आएगी।

केशा उसे देखता रहा और नज़र हटा नहीं सका।

और तब आकृति ने — धीरे से, बहुत धीरे, मानो उसे कोई जल्दी न हो और आगे पूरी अनंतता पड़ी हो, — सिर घुमाया।

उसकी ओर।

किताब में हथेलियाँ दीये की रोशनी में पढ़ी जाती हैं। Palmy आपकी हथेली तस्वीर से पढ़ता है। आज़माएँ