पाँच हथेलियाँ
6 मार्च 2020
कुछ दिन ऐसे होते हैं जब लगता है कि सारे शहर ने मिलकर साज़िश की है और अपने सबसे असहनीय बाशिंदों को तुम्हारे पास भेज दिया है — और एक-एक करके नहीं, सबको एक साथ, ताकि कोई कसर न रहे। छह मार्च ठीक ऐसा ही दिन था, और उसकी शुरुआत इससे हुई कि साढ़े सात बजे, जब ग्रीशा अभी लोहे की सीढ़ियाँ उतर ही रहा था, दुकान के दरवाज़े पर पहले से तीन लोग खड़े थे।
सबसे आगे ऊदबिलाव की फ़र की टोपी वाला एक आदमी खड़ा था। टोपी इतनी बड़ी और इतनी रोएँदार थी कि उसके नीचे फ़ौरन आदमी ही नहीं दिखता था, — और आदमी छोटा-सा था, गोल-मटोल, गोल ही लाल-लाल चेहरे वाला, जिस पर छोटी-छोटी आँखें, छोटी-सी नाक और बड़ी, लटकी हुई, वालरस जैसी मूँछें समाई हुई थीं। उसके बदन पर ऊदबिलाव के कॉलर वाला कोट था, कोट के नीचे सूट, सूट के नीचे, जैसा बाद में पता चला, — वास्कट, और वास्कट की जेब से घड़ी की ज़ंजीर लटक रही थी, असली, जेब वाली घड़ी की, ढक्कन वाली। हाथ में आदमी चमड़े का एक फ़ोल्डर थामे था और उसे पेट से ऐसे चिपकाए था मानो उसमें सरकारी राज़ हों।
दूसरी एक महिला थी। महिला लंबी, दुबली, लोमड़ी की फ़र के कोट में, जालीदार पर्दे वाली हैट में, ऐसे चेहरे वाली जो पहली ही नज़र में दुनिया की हर चीज़ से नाराज़गी ज़ाहिर करता था, — और उसकी गोद में एक छोटा कुत्ता बैठा था। कुत्ता भूरा-लाल, रोएँदार, लोमड़ी जैसी नुकीली थूथन वाला, और दुनिया को ठीक उसी भाव से देख रहा था जिससे मालकिन, — इतना कि ग्रीशा उन्हें देखकर पल भर को उलझन में पड़ गया कि कौन किसे थामे हुए है।
तीसरा एक जोड़ा था — एक लड़का और एक लड़की, जवान, एक जैसी स्पोर्ट्स जैकेटों में, जो लगातार आपस में फुसफुसाते रहते और बीच-बीच में झगड़ने लगते — वह भी फुसफुसाकर, पर इतने उग्र ढंग से कि पूरी क्रिवाया पर सुनाई देता।
— नमस्ते, — ग्रीशा ने कहा। — हम दस बजे खोलते हैं।
— मुझे पता है, — ऊदबिलाव की टोपी वाले ने कहा। — मैं पहला हूँ।
— माफ़ कीजिए, — महिला ने कहा। — मैं पहले आई थी।
— जब आप आईं, मैं पहले से खड़ा था।
— आप खड़े नहीं थे। आप इधर-उधर टहल रहे थे। जो इधर-उधर टहलता है, वह कतार में खड़ा नहीं होता।
— मैं ख़ुद को गरमा रहा था!
— घर पर गरमाइए।
महिला की गोद में कुत्ता भौंका — छोटा और तिरस्कार भरा, — और ऊदबिलाव की टोपी वाला एक क़दम पीछे हट गया।
ग्रीशा ने, जैसा सिखाया गया था, कहा:
— उस्ताद कतार के क्रम से देखते हैं। दिन में पाँच लोग। जिसने नाम लिखवाया, वही अंदर जाता है।
— लिखवाया? — टोपी वाले ने दोहराया। — कहाँ लिखवाया? मैंने कहीं नहीं लिखवाया!
— किसी ने नहीं लिखवाया, — ग्रीशा ने कहा। — मैं बस ऐसे कहता हूँ। जो पहले आया।
— मैं! — टोपी वाले और महिला ने एक साथ कहा।
स्पोर्ट्स जैकेट वाला जोड़ा, जिनके साथ इस बीच एक चौथा भी आ जुड़ा था — काम की वर्दी में एक अधेड़ आदमी, जिससे मछली की गंध आ रही थी, — यह सब चुपचाप, दिलचस्पी से देख रहा था, जैसे सर्कस देखते हैं।
ग्रीशा ने सिर खुजाया। उसके चार पन्नों के निर्देश-पत्र में इस हालत के लिए कुछ नहीं था। एक बिंदु था «अगर ग्राहक आपस में झगड़ें» — पर उसमें कुछ और बात थी: पति-पत्नी के बारे में, जो साथ आए हों और तय न कर पा रहे हों कि पहले कौन जाए। वहाँ लिखा था: «औरत को आगे जाने दो।» ग्रीशा ने सोचा और तय किया कि यह फ़िट बैठता है।
— औरत को आगे जाने देते हैं, — उसने कहा।
महिला ने विजयी भाव से ठुड्डी ऊपर की। कुत्ते ने भी। ऊदबिलाव की टोपी वाला इतना लाल पड़ गया कि उसकी मूँछें, लगा, खड़ी हो गईं।
— मैं, — उसने कहा, — आपकी जानकारी के लिए, विभाग का उप-प्रमुख हूँ! नगर प्रशासन का!
— आपसे मिलकर ख़ुशी हुई, — ग्रीशा ने कहा, क्योंकि जब कोई अपना परिचय दे तो यही कहना होता था।
— कुबिश्किन! पंतेलेइमोन सिसोयेविच!
— आपसे मिलकर ख़ुशी हुई, — ग्रीशा ने दोहराया और एहतियातन मन में लिख लिया: कुबिश्किन।
— और मैं, — पंतेलेइमोन सिसोयेविच ने और लाल होते हुए कहा, — मैं किसी… किसी कुत्ते के पीछे खड़े होने का इरादा नहीं रखता!
— यह कुत्ता नहीं है, — महिला ने बर्फ़ीली आवाज़ में कहा। — यह स्पिट्ज़ है।
दस बजे दुकान खुली, और लोमड़ी की फ़र वाली महिला सबसे पहले अंदर गई।
उसका नाम अंगेलीना मार्कोव्ना था। यह ग्रीशा को तब पता चला जब उसने किताब के लिए नाम पूछा, — और साथ में यह भी पता चला कि वह «ऐसी-वैसी नहीं» है, कि उसके दिवंगत पति «ऊँचे पद पर» थे, कि वह ख़ुद «एवेन्यू पर एलीट कॉस्मेटिक्स की दुकान चलाती है» और कि वह अपने लिए नहीं आई।
— तो किसके लिए? — ग्रीशा ने पूछा, क्योंकि ऐसे ही पूछना होता था।
— ज़ूज़ू के लिए, — अंगेलीना मार्कोव्ना ने कहा।
ग्रीशा ने उसकी ओर देखा। फिर कुत्ते की ओर। कुत्ते ने ग्रीशा की ओर देखा।
— ज़ूज़ू, — अंगेलीना मार्कोव्ना ने दोहराया, यह देखकर कि वह समझ नहीं रहा, — यह है। इसकी तबीयत ठीक नहीं। जानवरों के डॉक्टर हाथ खड़े कर देते हैं। मैं जानना चाहती हूँ कि इसके आगे क्या है। «सावधान» — यही मुझे चाहिए।
— उस्ताद हथेलियाँ पढ़ते हैं, — ग्रीशा ने सँभलकर कहा। — इंसानों की।
— ज़ूज़ू का पंजा है।
— वह हथेली नहीं है।
— नौजवान, — अंगेलीना मार्कोव्ना ने कहा, और उसकी आवाज़ बर्फ़ की सुई जैसी हो गई, — मैं पाँच चाँदी दूँगी। या दस। जितनी आप कहें। पंजे की फ़ोटो खींचिए।
ग्रीशा उलझ गया। फिर सँभला और वही किया जो हमेशा करता था जब समझ न आता कि क्या करे: «एक मिनट» कहा और परदे के पीछे चला गया।
— उस्ताद जी, — वह फुसफुसाया, — वहाँ एक महिला है। कुत्ते के साथ। चाहती है कि आप कुत्ते को पढ़ें।
परदे के पीछे सन्नाटा था। फिर केशा ने कहा:
— क्या?
— पंजा। कुत्ते का। «सावधान»। कहती है, दस चाँदी देगी।
फिर सन्नाटा रहा। फिर परदे के पीछे एक ऐसी आवाज़ आई जो ग्रीशा ने पहले कभी नहीं सुनी थी और फ़ौरन पहचान नहीं पाया। उस्ताद हँस रहे थे। धीरे, दबी आवाज़ में, मानो रोकने की कोशिश कर रहे हों और रोक न पा रहे हों।
— ठीक है, — आख़िरकार केशा ने कहा। — पंजे की फ़ोटो खींचो। पाँच चाँदी। दस नहीं।
ग्रीशा ने ज़ूज़ू के पंजे की फ़ोटो बारह मिनट तक खींची।
ज़ूज़ू फ़ोटो खिंचवाना नहीं चाहता था। ज़ूज़ू छटपटाता, गुर्राता, पंजा अपने नीचे दबा लेता, और जब ग्रीशा आख़िरकार उसे निकाल लेता — काटने की कोशिश करता। अंगेलीना मार्कोव्ना उसे थामे रहती और बुदबुदाती रहती: «ज़ूज़ू, मेरे सोने, ज़रा सह ले, यह तेरी ही भलाई के लिए है», — और ज़ूज़ू ग्रीशा को ऐसी नफ़रत से देखता मानो ग्रीशा इस पंजे की फ़ोटो नहीं खींचने, उसे काटने जा रहा हो।
आख़िरकार ग्रीशा ने फ़ोटो खींच ली: एक गुलाबी गद्दी, उससे छोटी चार नन्ही गद्दियाँ, बीच में भूरे-लाल बाल। रोशनी — बगल से, जैसा होना चाहिए। वह फ़ोटो परदे के पीछे ले गया।
केशा ने देखा। सोचा। और — ख़ुद को हैरानी हुई — कुछ दिखा। ज़्यादा नहीं: कुत्ते का महीना इंसान की झील के मुक़ाबले एक छोटी-सी पोखर जैसा था, — पर कुछ था। केशा ने क़लम डुबोई।
«सावधान। मार्च। इसे चॉकलेट मत दीजिए। वह, जो रसोई में नीले डिब्बे में है। उन्नीस को बालकनी में मत जाने दीजिए। बाक़ी महीना शांत है। अभी बहुत दिन जिएगा।»
अंगेलीना मार्कोव्ना ने पढ़ा, चौंककर साँस खींची, ज़ूज़ू को सीने से चिपका लिया।
— चॉकलेट! — उसने कहा। — इन्हें चॉकलेट के बारे में कैसे पता?! मैं तो… मैं तो उसे छिपाकर रखती हूँ! मैं तो उसे ऊपर वाली शेल्फ़ पर…
— उस्ताद देखते हैं, — ग्रीशा ने कहा।
अंगेलीना मार्कोव्ना ने मेज़ पर पाँच चाँदी रखीं, सोचा और दो और रख दीं। फिर किनारे पड़े काले सिक्कों को देखा, होंठ भींचे, पर कुछ कहा नहीं, और ज़ूज़ू को लेकर चली गई, जिसने जाते-जाते मुड़कर ग्रीशा को ऐसे देखा कि ग्रीशा समझ गया: ज़ूज़ू से उसकी मुलाक़ात फिर होगी।
दूसरे पंतेलेइमोन सिसोयेविच कुबिश्किन अंदर आए।
वे ऐसे आए जैसे, शायद, दफ़्तरों में आते थे: दरवाज़ा पूरा खोलकर, हाँफते हुए, पेट को झंडे की तरह आगे लिए। चारों ओर देखा। हरा परदा देखा। सीधे उसकी ओर बढ़े।
— वहाँ जाना मना है, — ग्रीशा ने उनके रास्ते में खड़े होते हुए कहा।
— मुझे इजाज़त है, — कुबिश्किन ने कहा।
— किसी को इजाज़त नहीं। उस्ताद ग्राहकों से नहीं मिलते।
— मैं ग्राहक नहीं हूँ। मैं — कुबिश्किन हूँ।
— आप ग्राहक हैं, — ग्रीशा ने दृढ़ता से कहा। निर्देश-पत्र का यह हिस्सा उसे सबसे अच्छी तरह याद था: «अगर ग्राहक परदे के पीछे जाने की कोशिश करे»। वहाँ लिखा था: «रास्ते में खड़े हो जाओ। धक्का मत दो। चिल्लाओ मत। दोहराते रहो: उस्ताद को ध्यान लगाना है। तब तक दोहराओ जब तक वह थक न जाए।»
— उस्ताद को ध्यान लगाना है, — ग्रीशा ने कहा।
— मुझे भी ध्यान लगाना है! — कुबिश्किन ने कहा। — सोमवार को मेरा मूल्यांकन है! इस पर निर्भर करता है — समझते हो, नौजवान? — इस पर निर्भर करता है कि विभाग-प्रमुख की कुर्सी पर मैं बैठूँगा! या वह… वह… स्वीरिदोव बैठेगा! मुझे जानना है! मुझे आपके उस्ताद से ख़ुद बात करनी है!
— उस्ताद को ध्यान लगाना है, — ग्रीशा ने कहा।
— मैं पैसे दूँगा!
— उस्ताद को ध्यान लगाना है।
— दुगने!
— उस्ताद को ध्यान लगाना है।
कुबिश्किन ने कुछ और कहने के लिए साँस भरी, पर ग्रीशा की ओर देखकर — उसके भोले, बिल्कुल अभेद्य चेहरे की ओर, — अचानक हवा ऐसे छोड़ दी जैसे पंक्चर गेंद, और कुर्सी पर बैठ गए।
— अच्छा, ठीक है, — उन्होंने कहा। — ठीक है। «काम»। कितना?
— दो चाँदी।
— बस इतना? — कुबिश्किन, लगा, बुरा मान गए। — यहाँ तो… यहाँ तो करियर का फ़ैसला हो रहा है!
— दो चाँदी, — ग्रीशा ने कहा। — कृपया, हथेली खोलिए।
कुबिश्किन ने दस्ताना उतारा — चमड़े का, फ़र वाला — और हथेली आगे बढ़ाई। उनकी हथेली गुदगुदी थी, गुलाबी, नरम, पाव जैसी, और अनामिका पर मुहर वाली सोने की मोटी अँगूठी बैठी थी। ग्रीशा उन्हें खिड़की की ओर ले गया।
तीसरे थे स्पोर्ट्स जैकेट वाले जवान।
उनके नाम देनिस और अलीना थे, और वे शादी करने वाले थे। यानी अलीना करने वाली थी, और देनिस — ग्रीशा ने उनकी फुसफुसाहट से यही समझा — करने वाला था, पर पूरी तरह नहीं। या पूरी तरह, पर अभी नहीं। या अभी, पर अलीना से नहीं। यहाँ ग्रीशा पूरी तरह उलझ गया।
वे «अपने और पराए» चाहते थे। दोनों। हर एक — दूसरे के बारे में।
— बता दें कि यह मुझसे झूठ बोलता है या नहीं, — अलीना ने कहा।
— बता दें कि इसे रात को कौन फ़ोन करता है, — देनिस ने कहा।
— मुझे कोई फ़ोन नहीं करता!
— तो फिर «ल्योशिक» कौन है? तेरे फ़ोन में «ल्योशिक» है!
— ल्योशिक मेरा भाई है!
— तेरा कोई भाई नहीं है!
— चचेरा!
ग्रीशा ने दोनों हथेलियों की फ़ोटो खींची — बारी-बारी, एक के बाद एक, — जबकि वे यह तय करने में लगे रहे कि ल्योशिक कौन है, और फ़ोटो परदे के पीछे ले गया। आधे घंटे बाद दो चर्मपत्र लाया। देनिस और अलीना ने अपना-अपना खोला — और चुप हो गए। पूरी सुबह में पहली बार। फिर एक-दूसरे को देखा। फिर अलीना ने धीरे से कहा: «ठीक है फिर», — और देनिस ने कहा: «तू ख़ुद ठीक है», — और वे हाथ पकड़कर चले गए, और ग्रीशा को कभी पता नहीं चला कि उनमें क्या लिखा था।
चौथा मछली की गंध वाला वर्दी पहने आदमी था। वह बाज़ार में, मछली वाली कतारों में काम करता था, उसका नाम स्तेपान था, और उसे «बटुआ» चाहिए था। चर्मपत्र उसने होंठ हिलाते हुए पढ़ा, बोला: «यह तो मुझे ख़ुद पता था», — और चला गया, अपने पीछे ऐसी गंध छोड़कर कि ग्रीशा आधे घंटे तक दरवाज़ा खुला रखे रहा।
और पाँचवीं एक बूढ़ी अम्मा थी, छोटी-सी, सूखी-सी, सिर पर रूमाल बाँधे, जो सारी सुबह चुपचाप सीढ़ियों पर खड़ी रही, किसी को धक्का दिए बिना, और जब उसकी बारी आई, तो बोली कि उसे कुछ नहीं चाहिए, वह बस देखना चाहती थी कि क्या सचमुच यहाँ दादा ग्रीशा का पोता बैठता है।
— सचमुच, — ग्रीशा ने कहा।
— तो अच्छा है, — अम्मा ने कहा, हरे परदे के आगे ऐसे क्रॉस बनाया जैसे किसी देव-प्रतिमा के आगे, और चली गई।
ग्रीशा उलझन में खड़ा रहा। पाँचवीं गिनी नहीं जाती थी — उसने कुछ नहीं लिया था। मतलब, किसी और को लिया जा सकता था। उसने सीढ़ियों पर झाँका। वहाँ कोई नहीं था।
— चार, — उसने परदे की ओर कहा। — आज चार।
— तो चार सही, — केशा ने जवाब दिया।
पर केशा उस वक़्त इस बारे में नहीं सोच रहा था कि वे कितने थे।
वह उस फ़ोटो पर बैठा था जो ग्रीशा ने दूसरी खींची थी, — अनामिका पर सोने की अँगूठी वाली गुदगुदी गुलाबी हथेली पर, — और पंतेलेइमोन सिसोयेविच कुबिश्किन का महीना देख रहा था।
महीना, महीने जैसा था। सोमवार को मूल्यांकन। विभाग-प्रमुख की कुर्सी — नहीं, नहीं मिलेगी, स्वीरिदोव बैठेगा, पर दुखी मत होइए, पंतेलेइमोन सिसोयेविच, छह महीने बाद स्वीरिदोव ख़ुद चला जाएगा, और तब… केशा ने छह महीनों के बारे में नहीं लिखा — यह «आगे» था, और आगे हमारा नहीं था। उसने सोमवार के बारे में लिखा। सावधानी से लिखा: «मूल्यांकन पास कर लेंगे। कुर्सी पर कोई और बैठेगा। बारह को उससे बहस मत कीजिए।»
और फिर, जैसा अब हमेशा करता था, बाईस पर लौटा।
कुबिश्किन का बाईस मार्च एक धब्बे से ढका था।
वैसा ही जैसा तमारा पेत्रोव्ना के यहाँ था। काला, गोल, फैले किनारों वाला, मानो महीने पर गीली कूची से थप्पड़ मार दिया गया हो। और उसके बाद — वैसे ही — सब फीका, उड़ा हुआ, मानो बचे हुए दिनों से रंग निकल गया हो।
केशा बैठा इस धब्बे को देखता रहा, और परदे के पीछे ग्रीशा मछली वाले स्तेपान को विदा कर रहा था और दरवाज़ा खुला रखे था, और गली से ठंड और मार्च की नमी आ रही थी।
तमारा पेत्रोव्ना — चुप-सी विधवा, पुस्तकालय वाली, स्लेटी कोट और हरे मफ़लर में। पंतेलेइमोन सिसोयेविच कुबिश्किन — विभाग के उप-प्रमुख, ऊदबिलाव की टोपी में, वालरस जैसी मूँछों वाले। वे एक-दूसरे को नहीं जानते थे। जान ही नहीं सकते थे। उनमें कुछ भी साझा नहीं था — सिवाय इसके कि दोनों केशा के पास आए थे। और कि दोनों का बाईस मार्च एक जैसे काले रंग से डूबा था।
केशा ने बाक़ी फ़ोटो देखीं — देनिस, अलीना, मछली वाला स्तेपान। ज़ूज़ू का पंजा भी देखा। कुछ नहीं। सबका बाईस, बाईस जैसा था: देनिस का — झगड़ा, अलीना का — सुलह, स्तेपान की — अच्छी बिक्री, ज़ूज़ू की — पार्क में सैर।
सिर्फ़ कुबिश्किन का।
केशा मेज़ से पीछे हटा। दो। इस हफ़्ते में उसने कितने पढ़े थे? शायद पच्चीस लोग। पच्चीस में से दो।
उसे अचानक समझ आया कि उसे क्या करना है। सारी फ़ोटो निकालनी होंगी — सारी, हफ़्ते भर की, दो हफ़्तों की, पूरे मार्च की — और हर एक देखनी होगी। एक-एक। बाईस तारीख़ पर।
वह अभी नहीं जानता था कि क्या मिलेगा। पर सीने में, पसलियों के नीचे, वहाँ जहाँ से हमेशा ज्ञान आता था, एक भारी ठंडा पत्थर पड़ा था। और वह पत्थर उससे कह रहा था: तुम्हें दो से ज़्यादा मिलेंगे।
किताब में हथेलियाँ दीये की रोशनी में पढ़ी जाती हैं। Palmy आपकी हथेली तस्वीर से पढ़ता है। आज़माएँ