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हस्तरेखाविद · अध्याय 5

दादा का संदूक

· 13 मिनट का पाठ

5 मार्च 2020

दादा का नाम ग्रिगोरी येफ़िमोविच था, पर शहर में उन्हें कोई इस नाम से नहीं पुकारता था। उन्हें बस दादा ग्रीशा कहा जाता था, उनसे बड़ी उम्र के लोग भी कहते थे, और — केशा ने ख़ुद सुना था — इलाक़े का वह पुलिसवाला भी, जो एक बार किसी काम से उनकी दुकान आया था और जाते-जाते बोला था: «अच्छा, चलता हूँ, दादा ग्रीशा।» मानो यह उपनाम नहीं, कोई ओहदा हो। छोटे शहर में ऐसा होता है: एक दादा ग्रीशा हैं, एक तोस्या दादी हैं, एक मीशा चाचा चौकीदार हैं, और किसी को उनके कुलनाम याद नहीं, और अगर याद हों भी, तो सुनकर डर लगता है, मानो जिस आदमी को ज़िंदगी भर जाना हो उसे अचानक किसी पराए नाम से पुकार दिया गया हो।

वे लंबे थे, झुके कंधों वाले, बड़े हाथों और बड़े सिर वाले, जिस पर मरते दम तक घने, बिल्कुल सफ़ेद बाल उगते रहे। वे धीरे चलते थे, धीरे बोलते थे, और जो कुछ करते थे, ऐसे करते थे मानो उनके आगे पूरी अनंतता पड़ी हो और जल्दी करने की कोई ज़रूरत न हो। पाइप पीते थे — दिखावे के लिए नहीं, सच में, कड़ा, सस्ता तंबाकू, जिसकी गंध दुकान के कोनों में आज भी, बारह साल बाद, आती थी। रूसी साफ़ बोलते थे, पर कभी-कभी, जब ग़ुस्से में होते या बहुत ख़ुश होते, अचानक किसी और बोली पर उतर आते, सुरीली, गँवई, ऐसे शब्दों वाली जिन्हें केशा नहीं समझता था।

— दादा, तुम कहाँ के हो? — एक बार नन्हे केशा ने उनसे पूछा।

— यहीं के, — दादा ने कहा।

— नहीं, पहले। तुम तो पहले यहाँ के नहीं थे।

दादा ने सफ़ेद भौंहों के नीचे से उसे देर तक देखा।

— पहले, पोते, कोई भी यहाँ का नहीं था, — उन्होंने कहा। — पहले तो तू भी नहीं था। जा, हाथ धो आ।

और केशा हाथ धोने चला गया। वह वैसे भी आज्ञाकारी बच्चा था।


केशा को दादा ने अकेले पाला था। केशा का पिता उसी रात मरा जिस रात केशा पैदा हुआ — इकतीस दिसंबर, बानवे, नए साल की रात। एक हादसा, दादा यही कहते थे, और इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहते थे, और केशा ने कभी कुरेदा नहीं: उस आदमी के बारे में क्या पूछना जिसे कभी देखा ही न हो? माँ चली गई जब केशा एक महीने का भी नहीं था, — चली गई और लौटी नहीं। क्यों — यह भी दादा नहीं बताते थे। «नहीं कर पाई», — उन्होंने एक बार कहा, जब केशा दस साल का था और आख़िरकार पूछ ही बैठा। «क्या नहीं कर पाई?» — «कुछ भी नहीं कर पाई। लोगों के साथ ऐसा होता है, पोते। फ़ैसला मत सुना।» और केशा ने फ़ैसला नहीं सुनाया। वह माँ और पिता की ठीक से कल्पना भी नहीं कर पाता था: वे जैसे किसी ऐसी किताब के लोग थे जिसे उसने पढ़ा नहीं था।

पर दादा थे।

दादा उसे सुबह उठाते, दलिया खिलाते — हमेशा एक ही, कूटू का, दूध के साथ, — स्कूल छोड़ते, और स्कूल के बाद लेकर दुकान ले जाते, क्रिवाया पर, और केशा परदे के पीछे, दीवार के पास छोटी मेज़ पर होमवर्क करता, जब तक दादा ग्राहकों को देखते।

तब दादा अभी ख़ुद देखते थे। ख़ुद लोगों के पास निकलते, ख़ुद उनसे बात करते, ख़ुद उनके हाथ अपने हाथों में लेकर देखते। फ़ोटो तब कोई नहीं होती थी — यानी थीं तो, बेशक, किसी-किसी के पास कैमरे वाले फ़ोन थे, पर दादा इन चीज़ों पर भरोसा नहीं करते थे। «हथेली को थामना होता है, — वे कहते। — ज़िंदा। गरम। कि उसमें ख़ून धड़के। तस्वीर में क्या देखेगा? तस्वीर में तू कुछ नहीं देखेगा।» वे आदमी का हाथ पकड़ते, उसे रोशनी की ओर घुमाते — वह भी बगल से, हमेशा बगल से, — और देखते, और चुप रहते, और लोग उनके सामने चुपचाप बैठे रहते, जैसे गिरजे में।

केशा परदे की झिरी से झाँकता था। उसे दिलचस्पी थी।

और जब वह आठ साल का हुआ, तो दादा ने एक शाम, दुकान बंद करके, उसे अपने सामने बिठाया, उसका हाथ लिया और कहा:

— चल, पोते। मेरी वाली देख।

और अपनी हथेली आगे बढ़ा दी।

केशा ने देखा। दादा की हथेली विशाल थी, सूखी, पीली, बारीक-बारीक झुर्रियों से भरी, जैसे कोई पुराना नक़्शा। उस पर रेखाएँ गहरी थीं, नालों जैसी।

— क्या दिखता है? — दादा ने पूछा।

— हथेली, — केशा ने कहा।

— और?

केशा देखता रहा। देर तक देखता रहा, आँखों में चुभन होने तक। और अचानक — वह बाद में कभी समझा नहीं पाया कि यह कैसे हुआ, — अचानक उसे दिख गया। आँखों से नहीं। मानो दादा की हथेली एक खिड़की हो, और खिड़की के पार एक कमरा हो, और कमरे में कोई चल रहा हो।

— कल, — केशा ने हिचकते हुए कहा, — तुम्हारा दाँत दुखेगा। यह वाला। — उसने अपने गाल की ओर इशारा किया।

दादा देर तक चुप रहे। फिर हाथ हटा लिया।

— बहुत अच्छे, — उन्होंने कहा। — बहुत अच्छे, पोते।

अगले दिन दादा का दाँत दुखा।

तब से दादा उसे हर शाम सिखाते रहे। लंबे समय तक सिखाया, सात साल, और अजीब ढंग से सिखाया: वैसे नहीं जैसे हस्तरेखा की किताबों में सिखाते हैं, जिन्हें केशा ने बाद में, बड़ा होकर, उत्सुकता से पढ़ा और उन पर हँसा। दादा उसे रेखाओं के नाम नहीं बताते थे, शुक्र और बृहस्पति के पर्वतों की बात नहीं करते थे, कोई ख़ाका नहीं बनाते थे। दादा बस उसे हाथ देते — अपने, ग्राहकों के, किसी के भी — और पूछते: क्या दिखता है? और फिर कहते: सही। या: ग़लत, फिर देख। और केशा फिर देखता।

और नियम। दादा के नियम ज़्यादा नहीं थे, पर वे उन्हें इतनी बार दोहराते थे कि केशा नींद में भी सुना सकता था।

देखना — एक महीने का। आगे मत देख। «आगे — हमारा नहीं।»

सिर्फ़ वही लिखना जो दिखे। अंदाज़ा मत लगा, गढ़ मत। «अंदाज़े से लिखेगा — अंदाज़े से सच होगा।»

दिन में पाँच से ज़्यादा नहीं। «तेरी आँखें सरकारी नहीं हैं।»

अपनी हथेली मत देखना। कभी नहीं। न आईने में, न फ़ोटो में, न अनजाने में। «अपनी — तेरी नहीं। अपनी चीज़ को मत छूना।»

और एक और, जो दादा ने सिर्फ़ एक बार कहा था, पर केशा को न जाने क्यों बाक़ी सबसे बेहतर याद रहा:

— जो तेरे घर में रहता है, उसकी हथेली मत पढ़ना। न बीवी की, न बच्चे की, न आश्रित की। जो तेरे साथ एक छत के नीचे सोता है — उसे मत पढ़ना।

— और तुम्हारी? — तब केशा ने पूछा था। — तुम तो एक छत के नीचे हो।

— मेरी तो और भी नहीं, — दादा ने कहा और मुस्कुराए। — तूने उस बार, दाँत वाली बात, — वह मैंने तुझे करने दी थी। एक बार। अब और नहीं।


दादा तब मरे जब केशा पंद्रह साल का था।

दुकान के पिछले कमरे में मरे, उसी पलंग पर जिस पर अब केशा सोता था। ज़्यादा दिन बीमार नहीं रहे — एक हफ़्ता, शायद कम। केशा को वह हफ़्ता ठीक से याद नहीं था, टुकड़ों में: दवाओं और तंबाकू की गंध याद थी, याद था कि दादा रात को कैसे खाँसते थे, याद था कि वह ख़ुद पलंग के पास स्टूल पर बैठा रहता था और समझ नहीं पाता था कि क्या करे। याद था कि डॉक्टर आया था। याद था कि दादा ने डॉक्टर को भगा दिया था, कहते हुए: «ज़रूरत नहीं, डॉक्टर साहब, मैं जानता हूँ।» याद थी — धुँधली, जैसे पानी के पार से, — आख़िरी शाम: अँधेरा, बस मेज़ पर लैंप, और दादा उसे पुकारते हैं — «पोते», — और केशा पास जाता है…

और आगे — कुछ नहीं। आगे केशा को याद नहीं था। मानो इस जगह किसी ने पन्ना फाड़ दिया हो। अगली चीज़ जो उसे याद थी, — वह सुबह थी, स्लेटी, और दादा पलंग पर लेटे हैं, और उनके हाथ सीने पर रखे हैं, और यह अब दादा नहीं हैं।

संदूक दादा उसके लिए छोड़ गए थे। मौत से एक हफ़्ता पहले यही कहा था, जब अभी बोल सकते थे: «संदूक — तेरा। बस खोलने की जल्दी मत करना। जब ज़रूरत होगी — खोल लेना।»

— और ज़रूरत कब होगी?

— पता चल जाएगा, — दादा ने कहा।

और केशा ने नहीं खोला। बारह साल। संदूक पिछले कमरे में, कोने में, पलंग के सिरहाने रखा था — बड़ा, लकड़ी का, लोहे से जड़ा, कभी नीले रंग से रँगा, और अब रंग उखड़कर नीचे की स्लेटी लकड़ी तक जा पहुँचा था। उस पर केशा की किताबें पड़ी रहतीं, पानी का गिलास रखा रहता, उसके कपड़े पड़े रहते। वह कमरे का हिस्सा था, दीवार या फ़र्श की तरह। केशा कभी-कभी हफ़्तों भूल जाता कि यह संदूक है और इसमें कुछ है।

पर इस रात उसे याद आया।


उसने ढक्कन से किताबें, कपड़े, गिलास हटाए। ढक्कन भारी था। संदूक पर ताला नहीं था — बस लोहे का एक कुंडा, जिसमें कुछ नहीं फँसा था। केशा ने किनारा पकड़ा और खींचा।

ढक्कन एक लंबी, कराहती चरमराहट के साथ उठा, और संदूक से तंबाकू का भभका आया। दादा का तंबाकू, कड़ा, सस्ता, — इतना गाढ़ा, इतना जीता-जागता, मानो दादा अभी, एक मिनट पहले, यहीं बैठे अपना पाइप पी रहे हों। केशा पीछे हट गया। उसका गला रुँध गया।

फिर उसने भीतर झाँका।

ऊपर कपड़े थे। दादा का कोट, स्लेटी, कोहनियों पर चमड़े के पैबंद। पतलून। कमीज़ें, ऐसे सलीक़े से तह की हुई जैसे दुकान में। केशा उन्हें एक-एक करके निकालता और पलंग पर रखता गया, और हर एक से तंबाकू की और किसी और चीज़ की गंध आती थी — कुछ गँवई, घास की, या सूखी बूटियों की।

कपड़ों के नीचे — पाइप। वह नहीं जो दादा पीते थे, — दूसरा, पुराना, टूटे मुँहनाल वाला, जिस पर मोटा धागा लिपटा था। तंबाकू की थैली। माचिस की एक डिब्बी, इतनी पुरानी कि उसका लेबल उड़कर सफ़ेद हो गया था।

फ़्रेम में एक तस्वीर, उल्टी रखी। केशा ने उसे पलटा। श्वेत-श्याम, समय से भूरी पड़ी हुई: एक जवान आदमी और एक जवान औरत, किसी झोंपड़ी के पास बेंच पर साथ-साथ बैठे। आदमी — लंबा, चौड़े कंधों वाला, कढ़ाईदार कुर्ते में, माथे पर लट। केशा उसे देर तक देखता रहा, तब पहचाना: दादा। दादा, जवान, कोई पच्चीस साल के, उससे ज़्यादा नहीं, — और तभी से उसी धीमे, भारी बैठने के ढंग के साथ, भौंहों के नीचे से उसी नज़र के साथ। और औरत…

औरत सुंदर थी। यही पहली बात मन में आती थी — «जवान» नहीं, «मुस्कुरा रही है» नहीं, बल्कि ठीक «सुंदर», जैसी पुरानी तस्वीरों की लड़कियाँ सुंदर होती हैं, जहाँ सब गंभीर देखते हैं, और बस वही एक मुस्कुरा रही होती है — और मुस्कान ऐसी कि जवाब में मुस्कुराने का मन करे। चोटी में गुँथे हल्के रंग के बाल। हाथ घुटनों पर रखे।

पीछे की ओर उड़ी हुई स्याही में: «ह्रित्स और मरीयका। 1968»।

दादी। केशा जानता था कि उनका नाम मारिया था, — दादा ने बताया था। जानता था कि वे तब मरीं जब केशा एक साल से भी छोटा था। और इससे ज़्यादा कुछ नहीं जानता था। दादा उनके बारे में कभी कुछ नहीं बताते थे। घर में उनकी कोई तस्वीर नहीं थी — केशा सोचता था, बची ही नहीं। और वे यहाँ थीं।

केशा ने तस्वीर पलंग पर, कपड़ों के पास, तकिये से टिकाकर खड़ी कर दी। जवान दादा और जवान दादी 1968 से उसे देख रहे थे।

तस्वीर के नीचे कुछ काग़ज़ थे, सुतली से बँधे, — बिल, रसीदें, दुकान के पुराने दस्तावेज़। एक बच्चे का चित्र — केशा ने अपना हाथ पहचाना, कोई छह साल की उम्र का: घर, सूरज, एक बड़ा आदमी और एक छोटा आदमी हाथ पकड़े। नीचे छपे अक्षरों में: «दादा और मैं»। केशा को याद नहीं था कि उसने यह बनाया था। याद नहीं था कि दादा ने इसे सँभालकर रखा था।

और बिल्कुल तल में, काग़ज़ों के नीचे, चित्र के नीचे, एक कॉपी पड़ी थी।


यह पूरी तरह कॉपी नहीं थी। बल्कि — किताब, मोटी, गहरे चमड़े की जिल्द में, घिसी हुई, मोड़ों पर दरकी हुई। आकार में बड़ी हथेली जितनी। बिना कुछ लिखे — न जिल्द पर, न पीठ पर।

केशा ने उसे निकाला। वह उस सिक्के की तरह भारी थी — इतने आकार की किताब को जितना होना चाहिए उससे भारी।

जिल्द पर, ठीक बीच में, ताँबे की एक पट्टी जड़ी थी। केशा कॉपी को लैंप के पास ले गया और ग़ौर से देखा: पट्टी हथेली के आकार की थी। खुली हथेली, उँगलियाँ थोड़ी फैली हुई — असली आकार में, बड़े आदमी की, मर्दाना। और इस ताँबे की हथेली पर रेखाएँ खुदी थीं: जीवन, हृदय, मस्तिष्क, भाग्य, — सब, सारी टहनियों, द्वीपों, क्रॉसों समेत, गहरी, स्पष्ट, जैसे दादा के हाथ पर।

और जिल्द के किनारे-किनारे, जहाँ आम किताब में बस जिल्द ख़त्म हो जाती है, ताँबे की एक पट्टी चलती थी, और यह पट्टी पन्नों पर चढ़कर उन्हें थामे हुए थी — केशा ने कॉपी खोलने की कोशिश की और नहीं खोल सका। वह बंद थी। न कोई चाबी का छेद, न बटन, न हुक। कुछ नहीं, सिवाय जिल्द पर ताँबे की हथेली के।

केशा कॉपी को घुटनों पर रखे कुछ देर बैठा रहा।

फिर धीरे से, ठीक से समझे बिना कि ऐसा क्यों कर रहा है, — या शायद बहुत अच्छी तरह समझते हुए, — उसने अपनी हथेली ताँबे वाली पर रख दी।

ताँबा ठंडा था। केशा ने हाथ दबाया, उँगली से उँगली मिलाकर, और त्वचा के नीचे खुदी रेखाओं का उभार महसूस किया — मानो किसी पराई हथेली से हथेली मिला रहा हो, किसी मुर्दे की हथेली से।

कुछ नहीं हुआ।

उसने हाथ हटाया और देखा। उसकी हथेली ताँबे वाली से छोटी थी — साफ़ छोटी: उँगलियाँ ताँबे की उँगलियों के सिरों तक पूरे आधे सेंटीमीटर से नहीं पहुँचती थीं, और कलाई पतली थी। और रेखाएँ — उसने उन्हें देखा नहीं, दादा ने मना किया था, पर आँख के कोने से दिखा, — रेखाएँ वे नहीं थीं। बिल्कुल वे नहीं।

यह उसकी हथेली नहीं थी। यह दादा की हथेली थी। और ताला दादा के हाथ से खुलता था।

केशा उस पलंग पर बैठा था जिस पर दादा मरे थे, घुटनों पर दादा की कॉपी थामे, और बगल में दादा की तंबाकू की गंध वाली कमीज़ें पड़ी थीं, और तस्वीर से दादा और दादी देख रहे थे, जवान, 1968 में, — और उसे अचानक ख़याल आया कि दादा शायद सचमुच चाहते थे कि केशा इसे खोले। «जब ज़रूरत होगी — खोल लेना।» पर तब — कैसे? दादा का हाथ अब नहीं है। दादा का हाथ बारह साल से मिट्टी में है, शहर के क़ब्रिस्तान में, तीसरे हिस्से में, ग्रेनाइट की सिल के नीचे।

तो फिर बंद क्यों किया?

या — केशा ने सोचा, और इस ख़याल से उसे ठंड लगी, ताँबे की हथेली से भी ज़्यादा ठंड, — या दादा ने इसे उससे, केशा से, छिपाने के लिए बंद नहीं किया था। या दादा ने ऐसे बंद किया था कि उनके सिवा कोई न खोल सके।

और, मतलब, वे जानते थे कि किसी दिन आएँगे और खोलेंगे।

दीवार के पार, बगल के तहख़ाने में, पानी टपक रहा था। केशा बैठा उसे सुनता रहा, और घुटनों पर ताँबे की हथेली वाली भारी किताब थामे रहा, और ख़ुद को उसे वापस संदूक में रखने के लिए मजबूर नहीं कर सका।

किताब में हथेलियाँ दीये की रोशनी में पढ़ी जाती हैं। Palmy आपकी हथेली तस्वीर से पढ़ता है। आज़माएँ