तमारा पेत्रोव्ना
3 मार्च 2020
हर दुकान के, चाहे वह बेकरी हो, नाई की दुकान हो या बाज़ार के पास मोची की गुमटी, अपने बँधे हुए ग्राहक होते हैं, और मालिक उन्हें अपने रिश्तेदारों से बेहतर जानता है: जानता है कि कौन एक डबलरोटी और आधी काली रोटी लेता है, कौन बाल «पिछली बार जैसे, बस थोड़े छोटे» कटवाता है, कौन आठ साल से वही जूते मरम्मत को लाता है और हर बार कहता है कि यह आख़िरी बार है। बँधा ग्राहक सिर्फ़ पैसा नहीं होता, वह घड़ी होता है जिसके हिसाब से दुकान जीती है: आया — मतलब मंगलवार है; नहीं आया — मतलब बीमार है, और पड़ोसियों से पूछ लेना चाहिए। केशा के ऐसे ग्राहक कम थे, क्योंकि हर महीने हस्तरेखाविद के पास जाने की हिम्मत हर कोई नहीं करता, पर थे, और उनमें पहली थी तमारा पेत्रोव्ना।
तमारा पेत्रोव्ना हर महीने की तीन तारीख़ को आती थी। न दो को, न चार को, ठीक तीन को, और अगर तीन तारीख़ इतवार को पड़ती, तब भी आती, और दरवाज़े के पास तब तक खड़ी रहती जब तक ग्रीशा खोल न देता, — और ग्रीशा खोलता था, क्योंकि केशा ने कहा था: तमारा पेत्रोव्ना के लिए — हमेशा।
वह केशा के पास चौथे साल से आ रही थी। ग्रीशा से भी पहले, जब केशा ख़ुद, दिल पर पत्थर रखकर, ग्राहकों के पास बाहर आता था और ख़ुद उनके हाथों की फ़ोटो खींचता था, वह तब भी आती थी। और हमेशा एक ही चीज़ लेती थी: «दिल»। अपने लिए नहीं — बेटी के लिए।
— मुझे वेरोच्का के लिए चाहिए, — वह हर बार कहती, मानो ग्रीशा भूल सकता हो। — बस वेरोच्का के लिए।
तमारा पेत्रोव्ना पचास से ऊपर की थी, विधवा थी, ज़िला पुस्तकालय में काम करती थी और वैसे कपड़े पहनती थी जैसे वे औरतें पहनती हैं जिन्होंने बरसों पहले तय कर लिया हो कि अब सजने-सँवरने की किसके लिए: स्लेटी कोट, स्लेटी बेरे टोपी, नीची एड़ी के स्लेटी जूते। बस उसका मफ़लर हमेशा चटक होता था — कभी गहरा गुलाबी, कभी फ़िरोज़ी, कभी संतरे जैसा नारंगी, — और लगता था कि तमारा पेत्रोव्ना में जितना भी रंग बचा था, वह सब इसी मफ़लर में चला गया था।
उसकी बेटी, वेरा, दुकान में कभी नहीं आई थी। केशा उसके बारे में बस उतना जानता था जितना माँ बताती थी, और माँ बहुत बताती थी — ग्रीशा को, बेशक, केशा को नहीं, पर ग्रीशा बाद में दोहरा देता था, — और इन क़िस्सों से यह निकलता था कि वेरा चौबीस साल की है, कि वह होशियार, सुंदर और अभागी है, कि वह किसी दफ़्तर में काम करती है जहाँ उसकी क़द्र नहीं होती, कि वह माँ के साथ रहती है, हालाँकि कब की अलग रह सकती थी, और कि उसके कोई रिश्ते नहीं हैं और कभी नहीं रहे, «क्योंकि मेरी बेटी, जानते हैं, स्वाभिमानी है।»
और तमारा पेत्रोव्ना हर महीने यह जानने आती थी कि इस महीने वेरोच्का की ज़िंदगी में कोई आएगा या नहीं।
पर फ़ोटो वह अपनी हथेली की खिंचवाती थी।
यह नियमों के ख़िलाफ़ था। केशा सिर्फ़ उसी को पढ़ता था जिसका हाथ फ़ोटो में हो। पर बिल्कुल शुरुआत में, चार साल पहले, तमारा पेत्रोव्ना ने समझाया था कि वेरोच्का किसी हाल में भविष्य बताने वाले के पास नहीं जाएगी, कि वेरोच्का ऐसी चीज़ों पर हँसती है, और वह, माँ, जानना चाहती है, — और तब केशा ने सोचकर कहा था: «अपनी दीजिए।» क्योंकि माँ की हथेली में, अगर माँ सच में प्यार करती है, बेटी भी हमेशा दिखती है। उतनी साफ़ नहीं जितनी बेटी की अपनी हथेली में, — जैसे धुँधले शीशे के पार। पर दिखती है।
और केशा चौथे साल से माँ की हथेली के धुँधले शीशे के पार वेरा को देखता था और लिखता था: इस महीने — शांति। इस महीने — सहेली से झगड़ा होगा, बीस तारीख़ तक सुलह हो जाएगी। इस महीने — नौ तारीख़ उदास दिन है, माँ कुछ बेक कर दे। इस महीने — शांति। शांति। शांति।
तमारा पेत्रोव्ना पढ़ती, आह भरती, चर्मपत्र अपने हैंडबैग में मोड़कर रख लेती — केशा को शक था कि उसके घर में इन चर्मपत्रों की पूरी गड्डी पड़ी है, फ़ीते से बँधी हुई, — और अगली तीन तारीख़ तक के लिए चली जाती।
इस बार वह साढ़े आठ बजे आई। ग्रीशा अभी दहलीज़ धो ही रहा था — दूसरी बार, जैसा क़ायदा था, — और उस पर पानी गिराते-गिराते बचा।
— अरे, तमारा पेत्रोव्ना! नमस्ते!
— नमस्ते, ग्रीशा बेटा। — वह गीली जगह पर से सँभलकर लाँघी, जैसे किसी गड्ढे पर से। — उस्ताद हैं?
— हैं। वे हमेशा होते हैं।
आज उसका मफ़लर हरा था, चटक हरा, बसंत की घास जैसा, जिसका अभी नामोनिशान भी नहीं था: क्रिवाया पर मार्च की गंदी बर्फ़ पड़ी थी, और छतों से पानी टपक रहा था।
— मुझे वेरोच्का के लिए, — उसने कहा। — «दिल»।
— हमेशा की तरह, — ग्रीशा ने कहा।
— हमेशा की तरह।
वह ग्राहक की कुर्सी पर बैठी, दस्ताना उतारा और हाथ बढ़ाया। ग्रीशा उसे खिड़की के पास ले गया — तमारा पेत्रोव्ना को वह खिड़की के पास सँभालकर, कोहनी पकड़कर ले जाता था, जैसे दादी को ले जाते हैं, — उसकी हथेली रोशनी की ओर घुमाई और फ़ोटो खींच ली।
— बैठिए। मैं चाय चढ़ाता हूँ।
— शुक्रिया, ग्रीशा बेटा।
ग्रीशा फ़ोन लेकर परदे के पीछे गया।
केशा ने फ़ोन लिया। तमारा पेत्रोव्ना की हथेली को वह अच्छी तरह जानता था, अपनी से भी बेहतर, — अपनी को उसने, दादा की मनाही के चलते, कभी ग़ौर से नहीं देखा था। नरम, बारीक झुर्रियों वाली, छोटी उँगलियों वाली। जीवन-रेखा लंबी, पर फीकी। हृदय-रेखा गहरी, कटी हुई, जैसे छुरी से, — विधवाओं में अक्सर ऐसी होती है। और उसके नीचे, छोटी उँगली की जड़ के पास, एक पतली-सी टहनी — यही थी वेरा, यह रही, माँ के दिल के पास।
केशा ने ग़ौर से देखा, और महीना उसके सामने खुल गया, जैसे मोड़ से निकलते ही सड़क खुल जाती है।
तमारा पेत्रोव्ना का मार्च शांत था। काम, घर, पुस्तकालय। आठ तारीख़ — कुछ फूल, शायद सहकर्मियों से। ग्यारह को सिर दुखेगा। चौदह को वह देर तक खिड़की के पास खड़ी रहेगी। और वेरा…
केशा और नीचे झुका।
वेरा इस महीने रोज़ से ज़्यादा चमकीली थी। यह हैरानी की बात थी — चार साल से वह माँ की हथेली में मुश्किल से उभरती थी, जैसे काग़ज़ में वॉटरमार्क, और यहाँ अचानक मानो किसी ने स्याही बढ़ा दी हो। उन्नीस तारीख़। यह रहा। उन्नीस मार्च, शाम। वेरा एक आदमी से मिलेगी। एक मर्द से। कहाँ — केशा को नहीं दिखा, बस यह दिखा कि शाम होगी, ठंड होगी, और वेरा हँसेगी — लंबे अरसे में पहली बार सचमुच हँसेगी।
केशा को कुछ ख़ुशी जैसा महसूस हुआ। यह बेवक़ूफ़ी थी — उसे एक अनजान लड़की से क्या लेना-देना, जिसे उसने ज़िंदगी में एक बार भी नहीं देखा? — पर महसूस हुआ। चार साल से वह «शांति, शांति, शांति» लिख रहा था। और अब, आख़िरकार…
उसने क़लम डुबोई और लिखा:
«दिल। मार्च। उन्नीस की शाम वेरा एक आदमी से मिलेगी। हँसेगी। माँ पूछताछ न करे — वह ख़ुद बताएगी।»
सोचा और जोड़ा:
«आठ को आपको फूल मिलेंगे। ग्यारह को सिर का ख़याल रखिए।»
वह चर्मपत्र लपेटने ही वाला था कि किसी चीज़ ने उसकी नज़र को अटका लिया।
पहले तो वह समझा भी नहीं कि क्या। बस तमारा पेत्रोव्ना के महीने में, बिल्कुल आख़िर में, आख़िरी हफ़्ते के पास, कुछ ठीक नहीं था। जैसा होता है जब कोई जानी-पहचानी किताब पढ़ रहे हों और अचानक उस पन्ने पर, जिसे सौ बार पढ़ा है, छपाई की ऐसी ग़लती दिखे जो पहले नहीं थी।
केशा फ़ोटो पर लौटा और ध्यान से देखने लगा, दिन-ब-दिन।
बीस — शांति। इक्कीस — शांति, हालाँकि उसके मन में न जाने क्यों बेचैनी रहेगी। बाईस…
बाईस मार्च पर एक धब्बा था।
फ़ोटो पर नहीं — फ़ोटो पर सब साफ़ था। धब्बा वहाँ था जहाँ केशा महीना देखता था, — उस भीतरी नज़र में, जिससे वह देखता था और जिसे किसी को समझा नहीं पाता था। तमारा पेत्रोव्ना का बाईस मार्च काले से ढका था, गोल, किनारों पर फैला हुआ — बिल्कुल वैसा धब्बा जैसा पहली क्लास का बच्चा कॉपी में गिरा देता है, जब क़लम ज़्यादा डुबो लेता है।
केशा इस धब्बे को देखता रहा और कुछ समझ नहीं पाया।
सात सालों में उसने पराए महीनों में बहुत कुछ देखा था। मौतें देखी थीं — वे खाई जैसी दिखती थीं, किनारे जैसी, जिसके पार कुछ नहीं। बीमारियाँ देखी थीं — वे स्लेटी, धुँधली होती थीं, जैसे नदी पर कोहरा। मुसीबत देखी थी — वह तीखी, काँटेदार होती थी, मानो किसी ने महीने पर ज़ंग लगी कील फेर दी हो। प्यार भी देखा था, जो हमेशा गरम होता था और भीतर से चमकता था, जैसे शाम को खिड़की।
पर धब्बा उसने कभी नहीं देखा था।
यह मौत नहीं थी: बाईस के बाद महीना चलता रहा, आगे बढ़ता रहा — तेईस, चौबीस, बिल्कुल आख़िर तक। पर किसी अजीब ढंग से चलता था। फीका-फीका। मानो धब्बे के बाद महीने से रंग निकल गया हो।
और यह न बीमारी थी, न मुसीबत। यह कुछ ऐसा था जिसका नाम केशा नहीं जानता था। कुछ ऐसा जो बाहर से आता था।
वह धब्बे को देखता रहा, और उसे लगा — फिर से, जैसे पिछली रात चिकनी हथेली की फ़ोटो के साथ, — उसे लगा कि वह ज़रा-सा हिल रहा है। जैसे स्याही जो अभी सूखी न हो।
— उस्ताद जी, — परदे के पीछे से ग्रीशा ने पुकारा। — तमारा पेत्रोव्ना पूछ रही हैं, कितनी देर। उन्हें दस बजे काम पर पहुँचना है।
केशा चौंक पड़ा।
उसने चर्मपत्र को देखा। «उन्नीस की शाम वेरा एक आदमी से मिलेगी।» वह और भी लिख सकता था: «बाईस को सावधान रहिए।» या: «बाईस को घर पर रहिए।» या कुछ भी।
पर क्या? वह नहीं जानता था कि यह क्या है। वह नहीं जानता था कि किससे बचना है। और जो न जानते हो उसे लिखना — इसकी दादा सबसे सख़्त मनाही करते थे। «अंदाज़े से लिखेगा, — दादा कहते थे, — तो अंदाज़े से ही सच होगा। और फिर ख़ुद ही सुलझाता रह।»
केशा ने चर्मपत्र लपेटा, धागे से बाँधा और ग्रीशा को दे दिया।
तमारा पेत्रोव्ना ने उसे वहीं मेज़ के पास पढ़ा, हमेशा की तरह। ग्रीशा, दरवाज़े के पास खड़ा, देख रहा था कि उसका चेहरा कैसे बदला: पहले उसे यक़ीन नहीं हुआ, उसने दोबारा पढ़ा, फिर उसके होंठ काँपने लगे, फिर उसने चर्मपत्र को सीने से, हरे मफ़लर से, लगा लिया और फुसफुसाकर बोली:
— हे भगवान। आख़िरकार।
— देखा आपने, — ग्रीशा ने कहा, जो नहीं जानता था कि उसमें क्या लिखा है, पर देख रहा था कि कुछ अच्छा है।
— उन्नीस, — तमारा पेत्रोव्ना ने कहा। — ग्रीशा बेटा, उन्नीस! चार साल!
उसने हैंडबैग में हाथ डाला, बटुआ निकाला और मेज़ पर दो नहीं, तीन चाँदी रखीं।
— यह आपके लिए, — उसने कहा। — आपके और उस्ताद के लिए। शुक्रिया। उन्हें मेरा शुक्रिया कहिएगा।
ग्रीशा ने सिक्कों को देखा। फिर — मेज़ के दूसरे किनारे को, जहाँ दूसरे दिन से आठ काले, अनछुए सिक्के पड़े थे। तमारा पेत्रोव्ना ने उसकी नज़र का पीछा किया।
— अरे, यह आपके पास क्या है? पुराने ज़माने के?
— एक ग्राहक छोड़ गया, — ग्रीशा ने कहा। — उस्ताद ने छूने से मना किया है।
— सुंदर हैं, — तमारा पेत्रोव्ना ने अनिश्चित स्वर में कहा और न जाने क्यों अपनी तीन चाँदी उनसे दूर खिसका दीं। — अच्छा, मैं भागती हूँ। शुक्रिया आपका। शुक्रिया!
वह चली गई, और ग्रीशा ने सुना कि वह लोहे की सीढ़ियाँ कैसे चढ़ रही है — तेज़ी से, लगभग दौड़ते हुए, किसी छोकरी की तरह।
उस दिन बाक़ी ग्राहक बिल्कुल मामूली थे। एक आदमी आया जो जानना चाहता था कि उसकी गाड़ी बिकेगी या नहीं। एक छात्रा आई जिसे परीक्षाएँ पास करनी थीं। एक महँगे कोट वाला, मोटी सोने की अँगूठी पहने आदमी आया, जिसने «बटुआ» लिया और ग्रीशा को ऐसे देखता रहा मानो ग्रीशा उसका कुछ देनदार हो। छात्रा, जब तक ग्रीशा उसके हाथ की फ़ोटो खींच रहा था, लगातार पूछती रही कि अगर महीना बुरा निकला तो क्या «दोबारा परीक्षा» दी जा सकेगी, — मानो हस्तरेखा कोई इम्तिहान हो और कहीं डीन के दफ़्तर में कोई प्रोफ़ेसर बैठा महीनों को नंबर देता हो; और गाड़ी वाला आदमी आख़िर तक मोल-भाव करता रहा कि क्या आधे दाम में नहीं हो सकता, जब वह सिर्फ़ गाड़ी के बारे में जानना चाहता है और बाक़ी ज़िंदगी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं, और ग्रीशा ने सोचकर ईमानदारी से कहा कि ज़िंदगी गाड़ी से अलग करके नहीं पढ़ी जाती, «वह तो सारी एक ही हाथ पर है।» केशा ने सबको पढ़ा। गाड़ी बिकेगी, पर जितना चाहता है उससे सस्ती। परीक्षाएँ पास होंगी, एक को छोड़कर। पैसा चौदह को आएगा।
उनमें से किसी के बाईस तारीख़ को कुछ नहीं था। केशा ने जाँचा। अब वह हर किसी को जाँचता था: पहले महीना हमेशा की तरह पढ़ता, और फिर बाईस पर लौटकर देखता कि वहाँ कुछ है या नहीं। नहीं था।
शाम को उसने ग्रीशा को जल्दी छुट्टी दे दी, मेज़ पर बैठा और लैपटॉप पर तमारा पेत्रोव्ना की फ़ोटो खोली। फिर — उसकी हथेली की वह फ़ोटो जो ग्रीशा ने एक महीना पहले, तीन फ़रवरी को, खींची थी: केशा सारी फ़ोटो रखता था, एक-एक, महीनों के हिसाब से फ़ोल्डरों में। फिर — जनवरी वाली। दिसंबर वाली। नवंबर वाली। वह उन्हें एक के बाद एक खोलता गया और एक ही जगह देखता गया, उस महीने को जो इन फ़ोटो में अभी भविष्य था, — और कहीं, किसी में, कोई धब्बा नहीं था।
धब्बा अभी ही आया था। इस महीने। इस मार्च में।
केशा कुर्सी की पीठ से टिक गया और आँखें बंद कर लीं।
बाहर हवा थम गई थी। टंकी पर टीन अब नहीं खड़क रही थी। बस बगल के तहख़ाने में टपक रहा था, टपक रहा था, टपक रहा था, मानो वहाँ, दीवार के पार, कोई बहुत धीरज से समय गिन रहा हो।
तब केशा ने, ख़ुद न जानते हुए कि क्यों, दूसरा फ़ोल्डर खोला — वह, जिसमें कल से बस एक ही फ़ोटो थी। चिकनी हथेली की फ़ोटो।
रेखा उस पर थी। बाल जैसी पतली। छोटी उँगली के नीचे से — तिरछी, कलाई की ओर।
और वह लंबी हो गई थी। अब केशा को यक़ीन था: बाल भर नहीं, क़लम की मोटाई भर नहीं। साफ़ दिखने लायक़। कल वह हथेली के बीच में टूट जाती थी — और आज लगभग कलाई तक पहुँच गई थी और वहाँ, बिल्कुल किनारे पर, एक नन्हे-से हुक की तरह मुड़ गई थी, मानो किसी चीज़ की ओर इशारा कर रही हो।
केशा ने पहले कभी किसी रेखा को ऐसे जाते नहीं देखा था। किसी हथेली पर नहीं, किसी ज़िंदा आदमी में नहीं।
वह बैठा उसे देखता रहा, और अचानक समझा कि वह किसके जैसी है। रेखा जैसी नहीं। दरार जैसी। जैसी पुराने चीनी मिट्टी के प्याले पर होती है: चलती है पतली-पतली, मुश्किल से दिखती हुई — और फिर एक दिन प्याला तुम्हारे हाथों में दो टुकड़े हो जाता है।
किताब में हथेलियाँ दीये की रोशनी में पढ़ी जाती हैं। Palmy आपकी हथेली तस्वीर से पढ़ता है। आज़माएँ