चिकनी हथेली
2 मार्च 2020
हमारे शहर में अनिद्रा शर्म की बात नहीं, बल्कि, कह सकते हैं, सार्वजनिक मामला है। मोटर-डिपो के चौकीदार नहीं सोते, टैक्सी की डिस्पैचर औरतें नहीं सोतीं, अक्त्याब्रस्काया की बूढ़ियाँ नहीं सोतीं, जो रात के तीन बजे तक अपने दिमाग़ में सारे मुर्दों और सारी बहुओं को उलट-पलट चुकी होती हैं, बाज़ार गली की बेकरी नहीं सोती, जहाँ से सुबह पाँच बजे तक पूरी क्रिवाया में गरम रोटी की ख़ुशबू फैल जाती है, और, कहते हैं, ख़ुद नगर परिषद का अध्यक्ष भी नहीं सोता, क्योंकि उसे अल्सर है और जवान बीवी। इसलिए अगर हमारे शहर में किसी की खिड़की रात को जलती है, तो पड़ोसी डरते नहीं, बस सुबह समझदारी से कहते हैं: «क्यों, तुम्हें भी नींद नहीं आई?» — और बताने लगते हैं कि उन्हें ख़ुद क्यों नींद नहीं आई, और यह वे देर तक बता सकते हैं।
केशा पूरी रात नहीं सोया, और यह उसके स्वभाव के ख़िलाफ़ था।
वैसे वह अच्छी नींद सोता था — उस गहरी, सपनों से ख़ाली नींद, जो उन लोगों को आती है जिनके न बीवी है, न बच्चे, न क़र्ज़, न कोई अफ़सर। ग्यारह बजे लेटता, सात बजे उठता, और इन दोनों घड़ियों के बीच उसके साथ कुछ नहीं होता था। दादा कभी कहा करते थे कि हस्तरेखाविद को सपने नहीं देखने चाहिए: «सपने — पराई हथेलियाँ हैं, जो बिना पूछे तुझमें घुस आती हैं। दिन भर देख लिया — बहुत है।» केशा तब हँसता था, पर बाद में, जब असल में पढ़ने लगा, समझ गया कि दादा, हमेशा की तरह, सही थे।
पर इस रात वह लेटा ही नहीं।
वह मेज़ पर बैठा फ़ोटो देखता रहा। फिर उसे फ़ोन से पुराने लैपटॉप में डाला और बड़ी स्क्रीन पर देखने लगा। बड़ा करता, छोटा करता, चमक और कंट्रास्ट घुमाता, जैसा कभी-कभी करता था जब ग्रीशा बहुत ही अँधेरी फ़ोटो लाता। कुछ ऐसे फ़िल्टर लगाता जिनके बारे में पहले जानता भी नहीं था। और हर जगह, हर आकार में, हर फ़िल्टर में, हथेली चिकनी ही रही।
यह ख़राब फ़ोटो नहीं थी। केशा ने हज़ारों ख़राब फ़ोटो देखी थीं — धुँधली, ज़्यादा रोशनी वाली, खिड़की के सामने ऐसे खींची कि हथेली काली परछाईं बन जाए, बिल्कुल पास से खींची कि फ़्रेम में बस दो उँगलियाँ आएँ। यहाँ सब ठीक था: रोशनी, कोण, स्पष्टता। त्वचा का हर रोमछिद्र दिख रहा था। अँगूठे की जड़ के पास छोटा-सा निशान दिख रहा था, पुराना, सफ़ेद। दिख रहा था कि नाख़ून साफ़ हैं, छोटे कटे हुए, अर्धचंद्रों के पास थोड़े नीले।
रेखाएँ नहीं थीं।
सुबह पाँच बजे तक केशा समझ गया कि अब और नहीं देख सकता, उसने लैपटॉप बंद किया, परदे के पीछे से निकला और ग्राहक की कुर्सी पर बैठ गया। बैठा — और फ़ौरन उठ खड़ा हुआ, क्योंकि याद आया कि उस पर आख़िरी बार कौन बैठा था। दुकान के बीच खड़ा रहा। छोटी मेज़ की ओर देखा।
आठ सिक्के वहीं पड़े थे जहाँ उन्हें छोड़ा गया था।
वह पास गया और उन पर झुका, छुए बिना। लैंप की रोशनी में वे लगभग काले थे, जैसे बहुत दिनों से साफ़ न की गई चाँदी। आजकल के सिक्कों से बड़े — कोई डेढ़ गुना। एक तरफ़ कुछ राजचिह्न जैसा, या शायद कोई चेहरा, झलकता था, पर इतना घिसा हुआ कि समझ में न आए। दूसरी तरफ़ घेरे में कुछ अक्षर, वे भी घिसे हुए। हर सिक्के का किनारा ऊबड़-खाबड़, दंतुर था, मानो किसी ने सिक्कों को चबाया हो।
केशा ने उन्हें नहीं छुआ। वह समझा नहीं पाता कि क्यों; बस मन नहीं हुआ। जैसे मरी हुई चिड़िया को हाथ में लेने का मन नहीं होता, भले ही पता हो कि उससे अब कोई ख़तरा नहीं।
ग्रीशा साढ़े सात बजे आया, हमेशा की तरह, पर वैसा नहीं था जैसा हमेशा होता था।
आमतौर पर वह लोहे की सीढ़ियों पर ज़ोर-ज़ोर से पैर पटकता अंदर आता, ज़ोर से नमस्ते करता — «नमस्ते, उस्ताद जी!» — हालाँकि उस्ताद परदे के पीछे थे और उसे देख नहीं सकते थे, और फ़ौरन बाल्टी लेने चला जाता। पर आज ग्रीशा चुपचाप उतरा, जैसे दबे पाँव आ रहा हो, देर तक दहलीज़ पर खड़ा ग्राहक की कुर्सी को देखता रहा। फिर सिक्कों वाली मेज़ को देखा। फिर धीमे से बोला:
— नमस्ते, उस्ताद जी।
— इधर आओ, — केशा ने बुलाया।
ग्रीशा, जैसा था, जैकेट पहने ही, परदे के पीछे चला गया। यह भी असामान्य था: परदे के पीछे वह सिर्फ़ फ़ोटो या चर्मपत्र लेकर जाता था, काम से, यूँ ही — कभी नहीं।
— बैठो।
ग्रीशा दीवार के पास रखे स्टूल पर बैठ गया। स्टूल छोटा था, और ग्रीशा के घुटने लगभग ठुड्डी तक आ गए।
— बताओ।
— क्या बताऊँ, उस्ताद जी?
— सब। शुरू से। वह आया कैसे।
और ग्रीशा ने बताया। वह बुरी तरह बताता था, अटक-अटककर, बार-बार पीछे लौटता, गड़बड़ा जाता कि पहले क्या हुआ और बाद में क्या, पर केशा ने उसे हड़बड़ाया नहीं। वह ग्रीशा को जानता था: उसे हड़बड़ाओ तो वह बिल्कुल खो जाता और चुप हो जाता।
पता यह चला।
सीढ़ियों पर क़दम नहीं थे। यह ग्रीशा को अब पक्का याद था।
आदमी लंबा था, लंबे कोट में। टोपी के बारे में ग्रीशा ने पहले कहा कि थी, फिर — कि शायद नहीं थी, और फिर — कि उसे याद नहीं कि थी या नहीं, पर टोपी में वह उस आदमी की कल्पना कर सकता है, और बिना टोपी के — न जाने क्यों नहीं।
चेहरा — मामूली। यहाँ ग्रीशा सबसे ज़्यादा परेशान हुआ। केशा उससे आँखों के बारे में, नाक के बारे में, मुँह के बारे में, उम्र के बारे में पूछता — और हर सवाल पर ग्रीशा माथा सिकोड़ता, जवाब देने को मुँह खोलता, और फिर बंद कर लेता।
— कुछ तो, — केशा ने कहा। — बस एक बात। दाढ़ी मुँडी थी या दाढ़ी थी?
— पता नहीं, — ग्रीशा ने कहा, और अचानक वह इतना दुखी दिखने लगा कि केशा को पछतावा हुआ कि पूछा। — उस्ताद जी, मैंने उसे देखा था। पक्का देखा था। जब मैं बोलता हूँ तो हमेशा ग्राहक को देखता हूँ, आपने ही तो कहा है — चेहरे में देखो, बस आँखों से ज़रा ऊपर। मैंने देखा था। पर अब याद करता हूँ — और वहाँ जैसे… जैसे एक धब्बा है। जैसे किसी ने उँगली से मिटा दिया हो।
— ठीक है, — केशा ने कहा। — और नाम?
— नहीं बताया।
— तुमने पूछा था?
— पूछा था। — ग्रीशा ने सोचा। — या नहीं। मैं हमेशा पूछता हूँ। किताब के लिए। शायद पूछा था। पर उसने नहीं बताया।
— उसने क्या कहा?
— «उस्ताद से मिलने»। और फिर: «जो दिखे, वही देख लें»। और फिर: «तो — „सबसे बड़ा दिन“»। बस।
— और हाथ? तुमने उसका हाथ अपनी आँखों से देखा था? फ़ोटो में नहीं — ऐसे?
— देखा था, — ग्रीशा ने यक़ीन से कहा। — यह मुझे अच्छी तरह याद है। मैं उसे खिड़की के पास ले गया, घुमाया। हाथ जैसा हाथ। बस सफ़ेद। और ठंडा — मैंने उसे पकड़ा था न, जब घुमा रहा था। जैसे फ़्रिज से निकला हो। पर रेखाएँ थीं, उस्ताद जी। थीं। मैं ध्यान देता। मैं इतना भी बेवक़ूफ़ नहीं।
— तुम बेवक़ूफ़ नहीं हो, — केशा ने कहा। — मैं जानता हूँ।
ग्रीशा ने कृतज्ञता से उसकी ओर देखा।
— कहीं वह… — ग्रीशा ने शुरू किया। — कहीं जादूगर तो नहीं? ऐसे जादूगर होते हैं, मैंने इंटरनेट पर देखा है। हाथ पर कुछ मल लेते हैं, और…
— हो सकता है, — केशा ने कहा।
पर वह जानता था कि जादूगर नहीं। वह समझा नहीं पाता कि कैसे जानता था; बस जानता था, जैसे हमेशा जानता था, फ़ोटो देखते हुए, कि यह आदमी दो हफ़्ते बाद भाई से झगड़ेगा, और यह औरत तेईस तारीख़ को सड़क पर बटुआ पाएगी। यह ज्ञान दिमाग़ से नहीं आता था, बल्कि कहीं पसलियों के नीचे से, वह भारी और ठोस था, पत्थर की तरह, और उससे बहस करना बेकार था।
— पैसे, — केशा ने कहा।
ग्रीशा ने परदे की ओर देखा, जिसके पीछे सिक्कों वाली मेज़ थी।
— तुमने उसे उन्हें रखते देखा था?
— नहीं। मैं तो परदे के पीछे था। आपके साथ।
— और जब तुम उसके पास बाहर गए, तो वे पहले से पड़े थे।
— पड़े थे।
— आठ?
— आठ। मैंने गिने। बाद में। जब आपने कहा — मत छूना, तो मैंने नहीं छुए। बस गिने।
केशा ने सिर हिलाया।
— तुमने ऐसे पहले कभी देखे हैं?
— नहीं, — ग्रीशा ने कहा। फिर सोचा। — हालाँकि… मेरी नानी के पास, माँ की माँ के पास, एक डिबिया थी। उसमें बटन रहते थे और ऐसी-वैसी चीज़ें। और उसमें एक ऐसा सिक्का भी था। बड़ा, काला। नानी कहती थी, शुभ है। मैं छोटा था, खेलने के लिए लेना चाहा, तो नानी ने हाथ पर मारा। बोली: «मत छू, हमारा नहीं है।»
— «हमारा नहीं है» का क्या मतलब?
— पता नहीं। उसने ऐसा कहा था। — ग्रीशा ने कंधे उचकाए। — नानी बहुत कुछ कहती थी। जब मैं छह साल का था तब वह मर गई।
केशा चुप रहा।
— ठीक है, — आख़िरकार उसने कहा। — जाओ फ़र्श धोओ। हमेशा की तरह खोलेंगे।
— और इसका क्या? — ग्रीशा ने लैपटॉप की ओर सिर हिलाया, जिस पर, केशा जानता था, फ़ोटो अब भी खुली थी। — आप उसके लिए लिखेंगे? उसने पैसे दिए हैं। आठ चाँदी। «सबसे बड़ा दिन»।
और तब केशा ने समझा कि उसे नहीं पता क्या जवाब दे।
उन सात सालों में, जब से वह दुकान चला रहा था, — और पढ़ता वह, समझो, हर दिन था, पाँच हथेलियाँ, लगभग बिना छुट्टी के, सिवाय पिछले से पिछले साल के उन दो हफ़्तों के जब वह निमोनिया से पड़ा था, — तो, इन सारे सात सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि उसने न लिखा हो। ऐसा होता था कि फ़ोटो ख़राब हो — तब ग्रीशा दोबारा खींचता। ऐसा होता था कि आदमी का महीना ख़ाली हो, उसमें कुछ न होने वाला हो — तब केशा यही लिख देता: «शांत महीना। कुछ उम्मीद मत कीजिए।» ऐसा होता था कि हथेली में कुछ ऐसा हो जिसके बारे में न बताना ही बेहतर — और तब केशा सावधानी से लिखता, घुमा-फिराकर, ताकि आदमी ठीक उतना समझे जितना सह सके।
पर कुछ भी न लिखना — ऐसा कभी नहीं हुआ था।
— पता नहीं, — उसने कहा। — जाओ।
ग्रीशा चला गया। एक मिनट बाद परदे के पीछे बाल्टी खड़की, पोंछा छपछपाया।
केशा ने एक कोरा चर्मपत्र लिया, उसे खोला, कोनों पर दबाया — दो काँसे के बटखरों से, दवात से और आतशी शीशे से। क़लम डुबोई। स्क्रीन की ओर देखा।
«सबसे बड़ा दिन», — उसने ऊपर लिखा, जैसे हमेशा लिखता था। यह शीर्षक था; आगे तारीख़ लिखनी होती थी, और उसके नीचे — कि उस दिन क्या होगा और क्या करना है।
आगे उसने कुछ नहीं लिखा।
वह चर्मपत्र पर कोई आधा घंटा बैठा रहा। क़लम पर स्याही सूख गई, और उसने उसे फिर डुबोया। फिर से। ग्रीशा ने परदे के पीछे फ़र्श धो डाला, धूल झाड़ी, केतली चढ़ाई, चाय पी, मग धोया। और केशा बैठा ही रहा — और क़लम चर्मपत्र के ऊपर लटकी रही, और नीचे नहीं उतरी।
बिना रेखाओं की हथेली में एक भी दिन नहीं था। न बड़ा, न छोटा। एक भी नहीं। इस आदमी का महीना ख़ाली था — वैसे नहीं जैसे शांत महीना ख़ाली होता है, जिसमें कुछ नहीं होता, बल्कि पूरी तरह, साफ़, जैसे वह कुआँ ख़ाली होता है जिसमें पानी नहीं। शांत महीने में ज़िंदगी फिर भी बहती है, बस बराबर, बिना उछाल के; वह दिखती है, जैसे शांत नदी में धारा दिखती है। यहाँ नदी नहीं थी। यहाँ तल था। सूखा।
ऐसा होता है, केशा ने सोचा, मुर्दों के साथ।
उसे याद आया कि एक बार, बहुत पहले, अभी दादा के ज़माने में, उनके पास एक आदमी की हथेली की फ़ोटो लाई गई थी, जो तीन दिन बाद मर गया। दादा तब देर तक देखते रहे, और फिर बोले: «देख रहा है, पोते, — कैसे कटती है? तीन दिन हैं, और फिर — जैसे छुरी से।» और केशा ने देखा: महीना था, था, और फिर कट जाता था। पर कटता तो था — और यहाँ कुछ शुरू ही नहीं हुआ था।
केशा ने क़लम रख दी, कोरा चर्मपत्र लपेटा और मेज़ की दराज़ में ठूँस दिया।
दिन हमेशा की तरह बीता — यानी पाँच ग्राहक आए, और केशा ने पाँचों को पढ़ा, और किसी हथेली में कुछ ख़ास नहीं था। एक लड़की बीस तारीख़ को पुरानी सहेली से मिलेगी। एक आदमी की नौकरी जाएगी, पर वह दुखी नहीं होगा, क्योंकि दूसरी, बेहतर मिल जाएगी। एक पेंशनर का मार्च शांति से बीतेगा, बस आठ तारीख़ को बाज़ार नहीं जाना चाहिए। पाँचवीं थी लोमड़ी की फ़र ओढ़े एक महिला, जो अपने लिए नहीं, पति के लिए आई थी, और देर तक ग्रीशा को समझाती रही कि पति ख़ुद नहीं आ सकता, क्योंकि विश्वास नहीं करता, पर हथेली की फ़ोटो उसने खींचने दी — नींद में, वह फ़ोटो खींचती रही जब वह खर्राटे ले रहा था, — और ग्रीशा ने सोचकर कहा कि नींद में चलेगा, निर्देश-पत्र में नींद के बारे में कुछ नहीं लिखा। केशा ने पति की हथेली भी पढ़ी: मार्च में वह वह नाव ख़रीदेगा जिसका वह बीस साल से सपना देखता था, और बीवी को यह अच्छा नहीं लगेगा। केशा तेज़ी से लिखता रहा, हमेशा की तरह, और हमेशा की तरह, लिखते समय, और कुछ नहीं सोचता था।
पर शाम को, जब ग्रीशा चला गया और केशा अकेला रह गया, उसने फिर लैपटॉप खोला।
उसे पता नहीं था क्यों। जो कुछ देखा जा सकता था, वह शायद सब देख चुका था। पर कुछ उसे खींच रहा था — जैसे उस आदमी को खींचता है जो जानता है कि बगल के कमरे में लाश पड़ी है, कि एक बार और दरवाज़े से झाँक ले।
बाहर हवा हुंकार रही थी, वही, कल वाली, और टंकी पर टीन अब लगातार खड़क रही थी। मेज़ पर लैंप बराबर जल रहा था। चाय ठंडी हो चुकी थी। कहीं दीवार के पार, बगल के तहख़ाने में, पानी टपक रहा था — केशा हर रात यह सुनता था और कब का आदी हो चुका था।
उसने फ़ोटो देखी।
चौड़ी पीली हथेली। लंबी उँगलियाँ। अँगूठे की जड़ पर सफ़ेद निशान। नाख़ूनों के नीले अर्धचंद्र।
और एक रेखा।
केशा पहले समझ ही नहीं पाया कि क्या देख रहा है। उसने पलकें झपकाईं। चेहरा स्क्रीन के पास ले गया। फ़ोटो बड़ी की।
रेखा बाल जितनी पतली थी, और फीकी, मुश्किल से दिखने वाली, पर थी। वह हथेली के किनारे से, छोटी उँगली के नीचे से, शुरू होती थी, वहाँ जहाँ लोगों की हृदय-रेखा शुरू होती है, और हथेली के आर-पार जाती थी — सीधी नहीं, जैसा होना चाहिए, बल्कि तिरछी, नीचे की ओर, कलाई की तरफ़, — और बीच में टूट जाती थी। मानो किसी ने उसे क़लम से खींचना शुरू किया और छोड़ दिया।
सुबह वह नहीं थी। केशा को इसका उतना ही पक्का यक़ीन था जितना इस बात का कि उसका नाम इनोकेंती है। वह पूरी रात इस फ़ोटो को देखता रहा था, हर सेंटीमीटर बड़ा करके, और वहाँ कोई रेखा नहीं थी।
और अब — थी।
केशा बैठा उसे देखता रहा, और उसे लगा — हालाँकि, बेशक, ऐसा हो नहीं सकता था, बस आँखें थक गई थीं, — उसे लगा कि जब तक वह देख रहा था, वह ज़रा-सी, बाल भर, क़लम की मोटाई भर, लंबी हो गई है।
उसने लैपटॉप बंद कर दिया।
दुकान में सन्नाटा था। परदे के पार, दरवाज़े के पास, छोटी मेज़ पर आठ काले सिक्के पड़े थे। और बगल के तहख़ाने में पानी टपकता ही जा रहा था, और केशा को अचानक ख़याल आया कि उसने कभी यह सवाल नहीं किया कि वहाँ, उस बगल वाले तहख़ाने में, क्या है, और वहाँ पानी है भी या नहीं, और वहाँ तहख़ाना है भी या नहीं।
उसने लैंप बुझाया और कपड़े उतारे बिना लेट गया, और अँधेरे में आँखें खोले सुबह तक पड़ा रहा।
किताब में हथेलियाँ दीये की रोशनी में पढ़ी जाती हैं। Palmy आपकी हथेली तस्वीर से पढ़ता है। आज़माएँ