विषय-सूची
हस्तरेखाविद · अध्याय 10

कहावत

· 12 मिनट का पाठ

10 मार्च 2020

हमारे शहर में सुबह-सुबह बहुत लोग गाते हैं, हालाँकि मानते कम हैं: दूधवाली ज़ीना बाज़ार में पनीर सजाते हुए गाती है, सातवीं मार्श्रुत्का का ड्राइवर गाता है, अगर गाड़ी में कोई अफ़सर न हो, कहते हैं, क्षेत्रीय अस्पताल का सर्जन भी गाता है जब ऑपरेशन से पहले हाथ धोता है, — और नीना तिमोशेंको, ग्रीशा की माँ, दावा करती है कि गाने से हमेशा पता चल जाता है कि अंजाम क्या होगा: अगर «ओय, मोरोज़, मोरोज़» जैसा कोई पुराना लोकगीत हो — मरीज़ बच जाएगा, अगर पुगाचोवा का कोई गाना हो — बेहतर है प्रार्थना करो। सुबह ग्रीशा फ़र्श धो रहा था और गा रहा था।

वह बुरा गाता था — ज़ोर से, सुर से बाहर, शब्द गड़बड़ाते हुए, — कोई ऐसा गाना जो मार्श्रुत्काओं में रेडियो पर बजता है, प्यार के बारे में और इस बारे में कि «तुम सबसे अलग हो»। बाल्टी खड़कती, पोंछा छपछपाता, ग्रीशा गाता, और इस सबसे दुकान में ऐसा मामूलीपन, ऐसी सुबह वाली बात थी कि केशा, पिछले कमरे से निकलकर, पल भर को संदेह में पड़ गया: क्या सच में हुआ था? कहीं सपना तो नहीं था? कहीं उसने ख़ुद नींद में दादा की आवाज़ नहीं सुनी — इसलिए कि सारी शाम दादा के बारे में, ग्रिगोरी के बारे में, ताँबे की हथेली वाली कॉपी के बारे में सोचता रहा था?

पर वह जानता था कि सपना नहीं था। वह सुबह तक हथेलियाँ गाल के नीचे रखे लेटा रहा था, और गाल को अब भी उनकी गरमी याद थी।

— नमस्ते, उस्ताद जी! — परदे की झिरी से उसे देखकर ग्रीशा चिल्लाया। — क्या बर्फ़ है! घुटनों तक! मार्श्रुत्का चलने लगी हैं, मैंने माँ को लिख दिया। और पेल्मेनी अभी बचे हैं, आपके लिए उबाल दूँ?

— ज़रूरत नहीं, — केशा ने कहा। — ग्रीशा। तुम सोए कैसे?

— ठीक, — ग्रीशा हैरान हुआ। — मुर्दे की तरह। क्यों?

— कुछ सपना तो नहीं आया?

ग्रीशा पोंछा हाथ में लिए सीधा हुआ और इतनी गहराई से सोच में पड़ गया मानो उससे सपने के बारे में नहीं, नौ के पहाड़े के बारे में पूछा गया हो।

— नहीं, — उसने कहा। — मुझे कभी कोई सपना नहीं आता। माँ कहती हैं, इसलिए कि मेरा सिर ख़ाली है। — वह हँसा, ज़रा भी बुरा माने बिना। — क्यों, मैं खर्राटे ले रहा था? माँ कहती हैं, मैं खर्राटे नहीं लेता।

— खर्राटे नहीं ले रहे थे, — केशा ने कहा। — बात कर रहे थे।

— क्या सच में! — ग्रीशा की आँखें फटी रह गईं। — क्या कह रहा था?

केशा उसे देखता रहा — उसके सीधे, चौड़े, कुछ न छिपाने वाले चेहरे को, बाहर निकले कानों को, हाथ में पोंछे को, जिससे अभी-अभी धुली सिलों पर पानी टपक रहा था, — और समझ रहा था कि ग्रीशा को याद नहीं। बहाना नहीं कर रहा। सच में याद नहीं। ग्रीशा वैसे भी बहाना करना नहीं जानता था; जब वह झूठ बोलता — और वह छह महीने में एक बार, सबसे छोटी-मोटी बातों पर झूठ बोलता था, — तो उसके कान लाल हो जाते, और यह गली के दूसरे छोर से दिखता।

अभी कान आम थे।

— कुछ बकवास, — केशा ने कहा। — माँ को पुकार रहे थे।

— अच्छा, — ग्रीशा ने निश्चिंत होकर कहा। — ऐसा होता है। — और फिर बाल्टी पर झुक गया।


केशा परदे के पीछे लौटा और मेज़ पर बैठ गया। बैठा रहा। फिर तय किया: जाँचना है।

वह नहीं जानता था कि ठीक-ठीक क्या जाँचना है। पर अगर रात को ग्रीशा में दादा बोल रहे थे — ग्रीशा नहीं, ग्रीशा का सपना नहीं, बल्कि दादा, — तो दादा का कुछ न कुछ दिन में भी बचा रहना चाहिए था। कुछ तो। जैसे बारह साल बाद दुकान के कोनों में तंबाकू की गंध बची रहती है।

— ग्रीशा, — उसने पुकारा। — इधर आओ।

ग्रीशा चोग़े से हाथ पोंछता हुआ आया।

— बैठो।

ग्रीशा दीवार के पास स्टूल पर बैठ गया।

— मैं तुमसे कुछ शब्द कहूँगा, — केशा ने कहा। — और तुम बताना कि उनका मतलब क्या है। अगर जानते हो। अगर नहीं जानते — तो यही कह देना।

— जैसे स्कूल में? — ग्रीशा उत्साहित हुआ। — इमला?

— कुछ वैसा ही।

— बोलिए।

केशा ने सोचा। दादा बहुत-से ऐसे शब्द बोलते थे जो केशा नहीं समझता था, — वे सुरीले, गँवई शब्द। केशा को कुछ याद रह गए थे, क्योंकि वे अक्सर दोहराए जाते थे, और एक बार, बड़ा होकर, उसने शब्दकोश में ढूँढा था कि उनका मतलब क्या है। यह बोली, वैसे, हमारे शहर में कोई अजूबा नहीं: आधा शहर कभी गाँवों से आया था, कोई पोल्तावा की तरफ़ से, कोई चेर्निगोव की तरफ़ से, कोई भगवान जाने कहाँ से, और बाज़ार की हर दूसरी अम्मा चुकंदर को «बुर्याक», प्याज़ को «त्सिबुल्या» कहती है, और जब उसका ग्राहक छिन जाए तो «ओय, लिशेंको» कहती है। पर नई पीढ़ी अब ऐसा नहीं बोलती, और ग्रीशा तो बिल्कुल नहीं — वह तो रूसी भी, साहित्य की टीचर के शब्दों में, «ऐसे बोलता था जैसे अंग्रेज़ी से अनुवाद कर रहा हो»। केशा ने सबसे आसान से शुरू किया।

— «ख़ाता», — उसने कहा।

— घर, — ग्रीशा ने कहा। — मतलब, गाँव का। यह तो सब जानते हैं।

— «रुश्निक»।

— तौलिया, — ग्रीशा ने अनिश्चित स्वर में कहा। — वैसा, कढ़ाई वाला। नानी के पास था।

यह भी, शायद, बहुत लोग जानते थे। केशा ने सोचकर एक कठिन शब्द चुना — उनमें से एक जो दादा तब कहते थे जब केशा की नाफ़रमानी पर नाराज़ होते।

— «शिबेनिक»।

ग्रीशा ने माथा सिकोड़ा।

— पता नहीं, — उसने कहा। — यह कोई गाली है? गाली जैसा सुनाई देता है।

— गाली है, — केशा ने कहा। «फाँसी पर लटकने लायक़» — यही इसका मतलब था। दादा यह बिना ग़ुस्से के, लगभग प्यार से कहते: «अरे तू शिबेनिक», — जब केशा प्याला तोड़ देता या कमीज़ गंदी कर लेता।

— «म्रिया», — केशा ने कहा।

— पता नहीं।

— «नेखाई»।

— पता नहीं। — ग्रीशा झेंपकर मुस्कुराया। — यह किस भाषा में है? यूक्रेनी में? मुझे यूक्रेनी नहीं आती। हमारे स्कूल में बस अंग्रेज़ी थी। वह भी मुझे नहीं आती।

केशा चुप रहा, और फिर धीरे से, ग्रीशा के चेहरे में देखते हुए, वह कहा जिसके लिए यह सब शुरू किया था:

— «हथेलियाँ गाल के नीचे»।

ग्रीशा ने उसे उलझन से देखा।

— अरे… — उसने कहा, — यह तब, जब सोने लेटते हैं? जैसे छोटे बच्चे? — उसने जुड़ी हुई हथेलियाँ गाल के नीचे रखीं और सिर झुकाकर दिखाया। — ऐसे?

— ऐसे, — केशा ने कहा। — और आगे?

— क्या — आगे?

— आगे कैसे? «हथेलियाँ गाल के नीचे…»

ग्रीशा ने सोचा। ईमानदारी से, मेहनत से, माथा सिकोड़कर और छत की ओर देखते हुए।

— पता नहीं, — उसने कहा। — «…और सो जा»? «…और निन्नी कर»? माँ मुझसे ऐसा नहीं कहती थीं। माँ कहती थीं: «आँखें बंद कर, वरना हौआ आ जाएगा।» — वह हँसा। — आप जानते हैं, मैं हौए से कितना डरता था! क्यों, उस्ताद जी, आगे जानना ज़रूरी था?

— नहीं, — केशा ने कहा। — ज़रूरी नहीं। जाओ।

ग्रीशा चला गया, अब भी उलझन में, और फिर बाल्टी खड़खड़ाने लगा, और एक मिनट बाद परदे के पार से फिर उसी «सबसे अलग» वाली के बारे में गाना आने लगा, बस अब धीमा और, लगा, दूसरे शब्दों के साथ — ग्रीशा, शायद, सोच में डूबकर चलते-चलते गढ़ रहा था।


केशा मेज़ पर बैठा अपने हाथों को देखता रहा।

ग्रीशा नहीं जानता था। न याद था, न समझता था, न शब्द पहचानता था, न कहावत। दिन में उसमें दादा नहीं थे — या इतने गहरे थे कि हाथ न पहुँचे। दिन में ग्रीशा ग्रीशा था: सोलह साल, बाहर निकले कान, ख़ाली सिर, हौआ।

और रात को?

केशा को वह याद आया जिसके बारे में दिन भर न सोचने की कोशिश करता रहा था। दादा का नियम: «जो तेरे साथ एक छत के नीचे सोता है — उसे मत पढ़ना। न बीवी को, न बच्चे को, न आश्रित को।»

ग्रीशा इस छत के नीचे सोया था। हर रात नहीं, पर सोया था। आज सोया था। और अगर केशा जानना चाहता कि ग्रीशा के साथ क्या हो रहा है — सच में जानना, कि उसके भीतर क्या है, कौन रात को उसमें दादा की आवाज़ में बोलता है, — तो उसे बस कहना होता: «ग्रीशा, ज़रा अपनी हथेली की फ़ोटो खींचो।» और ग्रीशा खींच देता। पूछता नहीं कि क्यों। उसे पूछने का ख़याल भी नहीं आता।

और केशा देख लेता।

और, शायद, कुछ दिख भी जाता।

वह बैठा इस बारे में सोचता रहा, और जितना ज़्यादा सोचता, उतना ज़्यादा उसका मन होता — और उतना ही ज़्यादा डर लगता। जैसा होता है जब छत के किनारे खड़े हो और जानते हो कि नहीं कूदोगे, किसी हाल में नहीं कूदोगे, — पर पैर फिर भी आगे खिंचते हैं।

दादा कभी कुछ यूँ ही मना नहीं करते थे। केशा यह बचपन में ही समझ गया था। «महीने से आगे मत देख» — केशा ने एक बार, कोई तेरह की उम्र में, चोरी-छिपे कोशिश की थी — किसी पराई हथेली में दो महीने आगे देखा था — और फिर तीन दिन बिस्तर से उठ नहीं पाया था, उसे उल्टियाँ होती रहीं, और आँखों के आगे सब तैरता रहा, जैसे झूले के बाद। दादा ने तब कुछ नहीं कहा, बस ऐसे देखा कि केशा का मन हुआ फ़र्श में धँस जाए। «दिन में पाँच से ज़्यादा नहीं» — केशा ने एक बार, पहले साल में, जब दुकान दोबारा खोली थी और बिल्कुल पैसे नहीं बचे थे, आठ पढ़ डाले थे, — और उसके बाद हफ़्ता भर कुछ नहीं देख पाया, किसी हथेली में नहीं, मानो अंधा हो गया हो। तब इतना डर गया था कि फिर कभी कोशिश नहीं की।

मतलब, यह नियम भी यूँ ही नहीं था। मतलब, अगर उसे पढ़ो जो एक छत के नीचे सोता है, — तो कुछ होगा। कुछ बुरा। केशा के लिए भी, और शायद उसके लिए भी जिसे वह पढ़ रहा हो।

नहीं, उसने तय किया। नहीं।


दिन हमेशा की तरह बीता, सिवाय इसके कि पहली ग्राहक, रोटी की दुकान की गुलाबी गालों वाली सेल्सगर्ल, ग्रीशा के लिए «कल की बर्फ़ के बदले» एक बगेल ले आई — ग्रीशा ने तूफ़ान में, पेल्मेनी लेने जाते हुए, उसकी दुकान की सीढ़ियाँ साफ़ कर दी थीं और ध्यान भी नहीं दिया था कि नेक काम किया है, — और ग्रीशा इतना घबरा गया कि उसके दूसरे हाथ की फ़ोटो खींच ली, और दोबारा खींचनी पड़ी। पाँच ग्राहक, एक — धब्बे वाला। सातवाँ। एक बुज़ुर्ग औरत, रिटायर्ड टीचर, «अपने और पराए»। केशा ने उसे वही लिखा जो दूसरों को: «बाईस को बाहर मत निकलिए। अगर पुकारें तो जवाब मत दीजिए।»

शाम को, जब ग्रीशा जाने लगा — मार्श्रुत्का चल रही थीं, बर्फ़ साफ़ कर दी गई थी, — वह दरवाज़े पर रुका, हाथों में टोपी घुमाई और बोला:

— उस्ताद जी। मैंने कुछ सोचा है।

— क्या?

— आप तो सबका देखते रहते हैं — किसका क्या है। ग्राहकों का। पर मेरा कभी नहीं देखा। — ग्रीशा झेंपते हुए, फ़र्श की ओर देखते हुए बोल रहा था। — तो मैंने सोचा। आप शायद चाहते हैं कि मैं बेहतर फ़ोटो खींचूँ। मैं तो खींचता रहता हूँ, खींचता रहता हूँ — पर ख़ुद नहीं जानता कि कैसी आती है। अच्छी या बुरी। बस।

उसने जैकेट की जेब में हाथ डाला, कुछ निकाला और ग्राहकों वाली मेज़ के किनारे रख दिया — उस तरफ़ जहाँ काले सिक्के नहीं थे। केशा नहीं देख पाया कि क्या: परदे के पीछे से दिख नहीं रहा था।

— यह मैंने प्रिंट कराया है, — ग्रीशा ने कहा। — उस ठेले पर, जहाँ ज़ेरॉक्स है। अपना हाथ। ख़ुद खींचा, फ़ोन पर, सुबह, जब आप सो रहे थे। रोशनी बगल से, सब जैसा होना चाहिए। नमूने के लिए। ताकि आप देख लें कि मैं सही खींचता हूँ या नहीं। कहीं ग़लत खींचता हूँ, और आप बताते नहीं, ताकि मुझे बुरा न लगे।

हमारे यहाँ ज़ेरॉक्स वाला ठेला एक ही है, डाकघर के पास, और उसे बहरी राया मौसी चलाती है, जो सब कुछ छापती है — प्रमाणपत्र, क़ब्र के पत्थरों के लिए फ़ोटो, कोर्स के निबंध, शादी के न्योते — और कुछ नहीं पढ़ती, क्योंकि उसूलन चश्मा नहीं पहनती; इसलिए उसके ठेले से शहर के सारे राज़ गुज़रते हैं, और सब राज़ ही रहते हैं।

वह एक पल और खड़ा रहा।

— अच्छा, मैं चला। कल मिलते हैं, उस्ताद जी।

— कल मिलते हैं, — केशा ने कहा।

सीढ़ियाँ गूँजीं। ऊपर इमारत का दरवाज़ा भड़ से बंद हुआ।

केशा मेज़ पर बैठा हरे परदे को देखता रहा। उसके पार, दरवाज़े के पास की छोटी मेज़ पर, आठ काले सिक्कों और तमारा पेत्रोव्ना की तीन चाँदी के बगल में, ग्रीशा की हथेली की फ़ोटो पड़ी थी। ठेले पर ख़राब प्रिंटर से छपी। सही खींची हुई — रोशनी बगल से, पूरा हाथ फ़्रेम में, उँगलियाँ थोड़ी फैली हुई।

केशा उसे देखना नहीं चाहता था।

वह उसे बहुत देखना चाहता था।

वह उठा, परदे के पीछे से निकला और छोटी मेज़ के पास गया।

फ़ोटो सीधी पड़ी थी — सादे काग़ज़ का एक पन्ना, एक कोने से ज़रा मुड़ा हुआ, जहाँ ग्रीशा ने उसे जेब में रखा था। केशा ने उसे नहीं देखा। जानबूझकर दूसरी तरफ़ देखता रहा, दीवार पर, दरवाज़े पर, «भावुकों के लिए» वाले टिश्यू के डिब्बे पर, — और हाथ से मेज़ पर पन्ना टटोला। काग़ज़ गरम था। ग्रीशा, शायद, उसे दिन भर अपनी जेब में लिए घूमता रहा था।

बिना देखे केशा ने उसे पलट दिया।

उल्टा। सफ़ेद तरफ़ ऊपर। सफ़ेद तरफ़ कुछ नहीं था — बस काग़ज़ के पार कुछ गहरी आकृतियाँ बारीक-सी झलक रही थीं: उँगलियाँ, कलाई, — और केशा ने उनसे भी नज़र हटा ली।

फिर मेज़ से अपनी एक बही उठाई — भारी, कैलिको की जिल्द वाली, दो हज़ार पंद्रह की, — उसे ऊपर रखा, दबाया और ऐसे ही छोड़ दिया।

और परदे के पीछे चला गया, और बैठ गया, और देर तक बैठा रहा, लैंप जलाए बिना, अँधेरे में, सुनता रहा कि दीवार के पार, बगल के तहख़ाने में, फिर — दो दिनों में पहली बार — पानी टपकना शुरू हो गया है।

किताब में हथेलियाँ दीये की रोशनी में पढ़ी जाती हैं। Palmy आपकी हथेली तस्वीर से पढ़ता है। आज़माएँ