विषय-सूची
हस्तरेखाविद · अध्याय 11

इलाक़े का पुलिसवाला

· 12 मिनट का पाठ

11 मार्च 2020

क्रिवाया के इलाक़े के पुलिसवाले का नाम सोमोव था, और पूरी क्रिवाया उसे जानती थी, और वह पूरी क्रिवाया को जानता था — कम से कम, वह ख़ुद तो यही समझता था।

वह कोई पैंतालीस साल का आदमी था, मँझले क़द का, गठीला, चौड़े और थके चेहरे वाला, जैसा उस आदमी का होता है जो इंसानियत से कब का और पूरी तरह निराश हो चुका हो, पर उसके प्रति अपने फ़र्ज़ निभाता रहे — बिना प्यार के, पर बिना कड़वाहट के भी, जैसे किसी बूढ़े, सनकी, पर फिर भी अपने चाचा के प्रति फ़र्ज़ निभाए जाते हैं। वह वर्दी वाली जैकेट पहनता था जो कंधों पर उसके लिए ज़रा तंग थी, और वर्दी वाली टोपी, जिसे वह बार-बार माथा खुजाने के लिए सिर के पीछे सरका देता। उसकी मूँछें भूरी-लाल थीं, ब्रश जैसी। आँखें — हल्की, चौकस, सूजी पलकों वाली, — ऐसे देखती थीं मानो जो कुछ देख रही हैं, वह पहले देख चुकी हैं और किसी बात पर हैरान नहीं होतीं।

कैप्टन विक्तोर पावलोविच सोमोव। पुलिस में बीस साल, जिनमें से पंद्रह — क्रिवाया और आसपास के इलाक़े का पुलिसवाला। इन पंद्रह सालों में उसने, अपनी गिनती के मुताबिक़, तीन सौ सैंतालीस घरेलू झगड़े सुलझाए, उन्नीस चोर, दो आगज़नी करने वाले और एक ऐसा आदमी पकड़ा जो रात को पड़ोसियों की बालकनियों से कपड़े चुराता और उन्हें अपने गैराज में सलीक़े से तह करके रख देता, उनके साथ कुछ किए बिना। तिरसठ भटके हुए बूढ़े और ग्यारह बच्चे ढूँढे। जलते हुए छप्पर से एक बकरी बचाई। बकरी ने बाद में उसे काट खाया।

हर तरह के रहस्यवाद को सोमोव वैसे ही देखता था जैसे कपड़ा-चोर को: थकी हुई हैरानी के साथ। भविष्य बताने वालों, ओझाओं, जादूगरों और बाक़ियों को वह धोखेबाज़ मानता था — शातिर नहीं, छोटे-मोटे, ऐसे जिन पर रपट लिखना भी अफ़सोस की बात हो। मादाम ज़ोया के यहाँ वह साल में एक बार, ड्यूटी के तौर पर, जाता था, यह देखने कि कोई शिकायत तो नहीं, — और हर बार सिर हिलाता हुआ निकलता। दादा ग्रीशा की दुकान में वह एक बार भी नहीं गया था। क्यों — ख़ुद नहीं जानता था। बस कभी मौक़ा नहीं पड़ा।

इलाक़े के पुलिसवाले को हमारे यहाँ वैसे भी विधायकों से बेहतर जानते हैं: विधायक को पाँच साल में एक बार पोस्टर पर देखते हैं, और पुलिसवाले को — रोज़, कभी बियर के ठेले के पास, कभी स्कूल के पास, कभी किसी इमारत की सीढ़ियों पर, जहाँ वह नोटबुक में लिखता है कि किसने किसकी खिड़की तोड़ी। पुलिसवाले के पास तब जाते हैं जब पड़ोसी इतवार को ड्रिल चलाए, जब बिल्ली खो जाए, जब पति रात को घर न आए, और कभी-कभी — बस बात करने, क्योंकि और किसी से बात करने को नहीं, और सोमोव, कराहते हुए, उन्हें भी सुनता जो बात करने आते: एक बार वह उन्नीस नंबर मकान की एक बुढ़िया के यहाँ दो घंटे बैठा रहा, जिसने उसे «संदिग्ध आवाज़» के लिए बुलाया था, और आवाज़ उसके अपने फ़्रिज की निकली, — और तभी गया जब उसने उसे अपनी पूरी ज़िंदगी सुना दी और चेरी के मुरब्बे के साथ चाय पिला दी।

और ग्यारह मार्च को, सुबह साढ़े दस बजे, सोमोव हस्तरेखाविद के यहाँ आया।


ग्रीशा अभी पहले ग्राहक को विदा कर ही रहा था — एक नौजवान, जिसने «काम» लिया था, — कि सीढ़ियों से, भारी और इत्मीनान से, वर्दी वाले जूते उतरे। दरवाज़ा खुला।

— नमस्ते, — सोमोव ने टोपी उतारते हुए कहा। — इलाक़े का पुलिस अधिकारी सोमोव। मालिक हैं?

ग्रीशा घबरा गया। चार पन्नों के निर्देश-पत्र में सब कुछ था — कि ग्राहक रोए तो क्या करना है, कि ग्राहक चिल्लाए तो क्या करना है, कि ग्राहक परदे के पीछे घुसे तो क्या करना है। पुलिस के बारे में उसमें कुछ नहीं था।

— उस्ताद ग्राहकों से नहीं मिलते, — ग्रीशा ने आदत से कहा।

— मैं ग्राहक नहीं हूँ, — सोमोव ने कहा। — मैं इलाक़े का पुलिसवाला हूँ।

— उस्ताद को ध्यान लगाना है।

सोमोव ने उसे देर तक देखा। फिर छाती वाली जेब से पहचान-पत्र निकाला और, खोलकर, ग्रीशा के चेहरे के सामने ऐसे थामे रहा जैसे कुत्ते की नाक के आगे सॉसेज का टुकड़ा थामा जाता है।

— नौजवान, — उसने धीरज से कहा, — मैं यहाँ एक आदमी के लापता होने के मामले में आया हूँ। मुझे मालिक से बात करनी है। बिल्कुल अभी। उन्हें यही बता दीजिए।

ग्रीशा ने परदे की ओर मुड़कर देखा। परदे के पीछे सन्नाटा था।

— उस्ताद जी, — ग्रीशा ने कहा, — यहाँ पुलिस से आए हैं।

परदे के पीछे थोड़ी देर चुप्पी रही, और फिर केशा की आवाज़ बोली:

— एक मिनट रुकने को कहो।

— रुक जाता हूँ, — सोमोव ने हामी भरी और, इजाज़त माँगे बिना, ग्राहक की कुर्सी पर बैठ गया। चारों ओर देखा। «भावुकों के लिए» वाले टिश्यू के डिब्बे पर नज़र ठहराई, हूँ किया। छोटी मेज़ को देखा, काले सिक्कों को, उस बही को जिसने कोई काग़ज़ दबा रखा था। कुछ नहीं बोला।


केशा परदे के पीछे बैठा था और उठ नहीं पा रहा था।

इसलिए नहीं कि पुलिस से डरता था, — डरने की कोई बात नहीं थी, दुकान बाक़ायदा पंजीकृत थी, टैक्स भरे हुए, काग़ज़ दुरुस्त। बल्कि इसलिए कि इस परदे के पार एक आदमी था, और वह आदमी उसे देखना चाहता था। आमने-सामने। ग्रीशा के ज़रिए नहीं, चर्मपत्र के ज़रिए नहीं। और केशा लोगों के सामने नहीं निकलता था — सच में नहीं निकलता था — शायद छह महीने से, जब से ग्रीशा आया था। ग्रीशा से पहले निकलता था, कुछ साल, बेमन से, «नहीं होता» के बावजूद, — और हर बार उसके बाद शाम को बेदम पड़ा रहता, मानो मालगाड़ी के डिब्बे ख़ाली किए हों।

«आदमी का लापता होना।»

केशा जानता था कि कौन लापता हुआ है। यह वह उसी पल से जानता था जब सोमोव ने ये शब्द कहे थे। उसी भारी पसलियों-तले वाले ज्ञान से। नौ मार्च। दो, तीन दिनों पर फैला धब्बा। और उसके बाद — स्लेटी, ख़ाली, उड़ा हुआ।

वह उठा और बाहर निकला।

सोमोव उससे मिलने को उठा — या तो शिष्टाचार से, या आदत से, — और वे एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े रहे। केशा देख रहा था कि पुलिसवाला उसे कैसे जाँच रहा है: दुबला, पीला, दादा के पैबंद लगे स्वेटर में, बिना दाढ़ी बनाए, अनिद्रा से धँसी आँखों वाला। शायद वह सबसे अच्छा नहीं दिख रहा था। शायद «संदिग्ध आदमी» के हुलिए पर क्रिवाया में किसी से भी ज़्यादा फ़िट बैठता था।

— सोमोव, — पुलिसवाले ने हाथ बढ़ाते हुए कहा। — विक्तोर पावलोविच।

केशा एक पल को अटका — हाथ मिलाना उसके लिए अनभ्यस्त और, सच कहें तो, अप्रिय काम था, — पर हाथ मिलाया। सोमोव की हथेली चौड़ी, सूखी और गरम थी। केशा ने, पुरानी आदत से, ज़रा-सा छूते ही — बिना देखे, बिना चाहे, — कुछ महसूस कर लिया: थकान, जागी हुई रातें, कोई पुराना दर्द, एक बेटी… उसने हाथ जितनी जल्दी चाहिए था उससे जल्दी खींच लिया।

— इनोकेंती, — उसने कहा।

— दादा ग्रीशा के पोते?

— पोता।

— आपके दादा को जानता था, — सोमोव ने अनपेक्षित रूप से कहा। — निजी तौर पर नहीं। बस, देखा था। वे, याद है, हमेशा शाम को टंकी के पास बेंच पर बैठे रहते थे। पाइप के साथ। सब उन्हें नमस्ते करते थे। — वह चुप रहा। — सख़्त बूढ़े थे।

केशा को नहीं सूझा कि इस पर क्या कहे।

— मैं क्या मदद कर सकता हूँ? — उसने पूछा।

सोमोव वापस कुर्सी पर बैठ गया — बिना बुलाए, मालिकाना अंदाज़ में, — और बग़ल में दबाए फ़ोल्डर से कुछ काग़ज़ निकाले।

— लेओनिद सेर्गेयेविच पस्तुख़ोव, — उसने पढ़ा। — जन्म उन्नीस सौ अट्ठानवे। डिलीवरी सर्विस का कूरियर। ऐसे किसी को जानते हैं?

केशा ने सिर हिलाया। फिर बोला:

— ल्योन्या। पीली जैकेट में।

— पीली जैकेट में, — सोमोव ने पुष्टि की। — वह आपके यहाँ आया था?

— पहली मार्च को।

— पक्का पहली को?

— ग्रीशा किताब में लिखता है।

ग्रीशा, जो दरवाज़े के पास खड़ा था, शेल्फ़ की ओर लपका, आगंतुकों की किताब निकाली, ढूँढा, दिखाया। सोमोव ने पढ़ा, सिर हिलाया, अपने काग़ज़ पर कुछ लिखा।

— नौ को लापता हुआ, — उसने कहा। — नौ की शाम संपर्क में नहीं आया। डिस्पैचर फ़ोन करता है — जवाब नहीं। ऑर्डर लटके हुए। दस की सुबह भी वही। उसकी माँ गाँव में रहती है, ओल्शान्का में, उसने फ़ोन किया — जवाब नहीं। कल शाम को उसने हमें फ़ोन किया। मैं आज सुबह उसके कमरे पर गया, — वह ज़ारेच्नाया पर एक कमरे वाला फ़्लैट किराए पर लेता था, — मकान-मालकिन के साथ दरवाज़ा खोला। कुछ नहीं। कोई नहीं। सामान अपनी जगह। फ़ोन अपनी जगह, मेज़ पर, डिस्चार्ज। उसकी पीली जैकेट अपनी जगह, खूँटी पर। उसका वह डिब्बा — वह भी अपनी जगह। जूते — अपनी जगह। और वह नहीं है।

— तो वह किसमें बाहर गया? — केशा ने पूछा।

— यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ, — सोमोव ने कहा। — अगर जैकेट खूँटी पर है, जूते गलियारे में। बाहर मार्च है। चप्पलों में, क्या? चप्पलें भी अपनी जगह हैं। मालकिन कहती है — उसके पास एक ही जोड़ी चप्पलें थीं।

ज़ारेच्नाया, जहाँ ल्योन्या कमरा किराए पर लेता था, — हमारे यहाँ ऐसा इलाक़ा है जहाँ वे आते हैं जिनके पास रहने को और कोई जगह नहीं: नदी किनारे साठ के दशक की पाँच-मंज़िला इमारतें, पॉपलर, जो गर्मियों में पूरे मोहल्ले को रुई से ऐसे ढक देते हैं कि गाड़ियाँ रुई में खड़ी लगती हैं, टीन के गैराज और एक बच्चों का पार्क, जिसमें नब्बे के दशक से कोई बच्चा नहीं खेला, क्योंकि वहाँ शाम को वे जमा होते हैं जिनके पास पीने को और कोई जगह नहीं। मकान-मालकिनें वहाँ फ़्लैट छात्रों, कूरियरों और नए जोड़ों को देती हैं, सस्ते में और बिना सवाल किए, और पड़ोसी एक-दूसरे को नहीं जानते और जानना भी नहीं चाहते। इसलिए अगर ज़ारेच्नाया पर कोई ग़ायब हो जाए, तो उसकी याद पड़ोसियों को नहीं, डिस्पैचर को आती है — अधूरे ऑर्डरों से, — और यह शायद ज़ारेच्नाया के बारे में कही जा सकने वाली सबसे उदास बात है।

वह चुप रहा।

— पड़ोसियों ने कुछ नहीं सुना। न झगड़ा, न शोर। इमारत के दरवाज़े वाले कैमरे ने नौ की शाम उसे नहीं देखा — न आते, न जाते। डिस्पैचर के रिकॉर्ड के मुताबिक़ उसने आख़िरी ऑर्डर छह बजकर चालीस मिनट पर बंद किया, घर से दो ब्लॉक दूर। और आगे — कुछ नहीं। मानो भाप बनकर उड़ गया।

केशा चुप था, और सोमोव उसे उस शांत, किसी बात पर हैरान न होने वाली नज़र से देख रहा था, जिससे वह शायद सारे गवाहों को देखता था, — कपड़ा-चोर को भी, फ़्रिज वाली बुढ़िया को भी, — और इंतज़ार कर रहा था।

«नौ। धब्बा। अगर नाम लेकर पुकारें — जवाब मत दीजिए।»

ल्योन्या के लिए उसने यह नहीं लिखा था। ल्योन्या के लिए उसने पहली मार्च को लिखा था, कोट वाले आदमी के आने से पहले। ल्योन्या के लिए उसने लिखा था: «दस को एक कैफ़े में एक लड़की से मिलोगे।» अच्छा, उजला महीना।

— मैं आपके पास, असल में, इसलिए आया हूँ, — सोमोव ने आगे कहा। — उसके सामान में यह मिला। — उसने फ़ोल्डर खोला और उसमें से पारदर्शी प्लास्टिक की फ़ाइल में लिपटी कोई चीज़ निकाली। — मेज़ पर पड़ा था। फ़ोन के बगल में। खुला हुआ। मानो उसने… अरे, ग़ायब होने से पहले — इसे पढ़ा हो। आपका है?

उसने फ़ाइल आगे बढ़ाई।

केशा ने उसे लिया, और फ़ाइल में एक चर्मपत्र था। उसका चर्मपत्र — मोटा, पीला-सा, ऊबड़-खाबड़ किनारों वाला, — वह इसे हज़ारों में पहचान लेता। किनारे मुड़े हुए थे, जैसे तब होते हैं जब लिपटा हुआ काग़ज़ देर तक जेब में पड़ा रहे। मोटे धागे का एक टुकड़ा अब भी एक कोने पर लटक रहा था।

— आपका? — सोमोव ने दोहराया।

— मेरा, — केशा ने कहा।

— आपकी लिखावट?

केशा ने लिखावट देखी: लिखावट उसकी थी। उसकी, केशा की, — तिरछी, बारीक, कुछ अक्षरों की लंबी पूँछों वाली, बड़े «स» पर ख़ास फंदे वाली। दादा की स्टील की क़लम, दादा की स्याही — काली, ज़रा लाल झलक वाली, जो केशा राजधानी की एक पुरानी दुकान से मँगाता था। शक की कोई गुंजाइश नहीं थी।

— मेरी, — केशा ने फिर कहा।

— तो अच्छा है, — सोमोव ने कहा। — फिर शायद आप समझा दें कि इसका मतलब क्या है?

केशा ने चर्मपत्र पर नज़र झुकाई और पढ़ने लगा।

पहली पंक्ति उसकी थी। «दिल। मार्च।» वह हमेशा ऐसे ही लिखता था।

और आगे वह नहीं था।

«लड़की नहीं लौटेगी। दस की शाम दूसरी से मिलोगे — उस कैफ़े में, जहाँ ऑर्डर उठाने जाओगे» — यह नहीं। वह नहीं जो उसने पहली मार्च को लिखा था, वह नहीं जो उसने देखा था। उसे यह चर्मपत्र याद था — उसे अपने सारे चर्मपत्र याद थे, कम से कम पिछले महीने के, — और यह उसे अच्छी तरह याद था, क्योंकि ल्योन्या का महीना उजला था, और उजले महीने केशा मज़े से लिखता था।

वहाँ कुछ और था। उसकी लिखावट में — उसकी, उसकी! — लंबी पूँछों और «स» पर फंदे के साथ, — लिखा था:

«नौ की शाम तुम्हें नाम लेकर पुकारेंगे। बाहर आ जाना। तुम्हारा कब से इंतज़ार है।»

केशा इन पंक्तियों को देखता रहा, और उसे लगा कि स्याही अभी सूखी नहीं है, हालाँकि चर्मपत्र दस दिन पुराना था, — इतनी गीली और काली वह लैंप के नीचे चमक रही थी, — और उसने महसूस किया कि पैरों तले फ़र्श धीरे-धीरे, बहुत धीरे, कहीं नीचे खिसकने लगा है, बगल के तहख़ाने में, वहाँ जहाँ पानी टपकता है।

— तो? — सोमोव ने पूछा। — इसका मतलब क्या है, इनोकेंती? «तुम्हें पुकारेंगे।» कौन पुकारेगा? कौन इंतज़ार कर रहा है? आप कुछ जानते थे? आपकी उससे कोई बात तय हुई थी?

केशा ने उसकी ओर आँखें उठाईं।

— यह मैंने नहीं लिखा, — उसने कहा।

किताब में हथेलियाँ दीये की रोशनी में पढ़ी जाती हैं। Palmy आपकी हथेली तस्वीर से पढ़ता है। आज़माएँ